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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज,व्याकरण वेदांताचार्य श्रीदादू द्वारा बगड़,झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज,बगड़ झुंझुनूं । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी ~ विनती कौ अंग ३४ - ४४/४७)*
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*दादू प्राणी बँध्या पंच सौं, क्योंही छूटै नांहि ।*
*निधणी आया मारिये, यहु जीव काया मांहि ॥४४॥*
यह जीवात्मा पांचों इन्द्रियों के विषय से बंधा हुआ है । आपकी कृपा के बिना किसी भी प्रकार से मुक्त नहीं हो सकता है । आप जैसे स्वामी के रहते हुए यह जीवात्मा शरीर में आकर बार-बार मालिक के बिना जैसे वस्तु नष्ट हो जाती है वैसे ही काल के द्वारा मारा जा रहा है । आपको रक्षा करनी चाहिये ॥४४॥
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*दादू कहै-*
*तुम बिन धणी न धोरी जीव का, यों ही आवै जाइ ।*
*जे तूँ साँई सत्य है, तो बेगा प्रकटहु आइ ॥४५॥*
इस जीव का आपके बिना कोई स्वामी नहीं है । जो इस की रक्षा कर सके । इसलिये यह संसार में बार-बार जन्मता मरता रहता है । यदि आप हमारे सच्चे स्वामी रक्षक है तो शीघ्र ही हमारे हृदय में प्रकट होकर दर्शनों के द्वारा जन्म-मरण रूपी क्लेशों से हमारी रक्षा कीजिये ॥४५॥
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*निधणी आया मारिये, धणी न धोरी कोइ ।*
*दादू सो क्यूँ मारिये, साहिब सिर पर होइ ॥४६॥*
यह जीवात्मा स्वामी रहित वस्तु के समान काल के द्वारा मारा जाता है । क्योंकि इसने अपना रक्षक तथा देखभाल करने वाले परमात्मा को नहीं अपनाया । जो सर्वभाव से भगवान् की शरण में चला जाता है तथा जिसका स्वामी रक्षा करने वाला सामने ही खड़ा है वह काल के द्वारा नहीं मारा जाता । क्योंकि उसकी रक्षा करने वाला परमात्मा उसके शिर पर ही खड़ा है ॥४६॥
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*॥ दया विनती ॥*
*राम विमुख जुग जुग दुखी, लख चौरासी जीव ।*
*जामै मरै जग आवटै, राखणहारा पीव ॥४७॥*
जो जीव राम के सन्मुख जाकर शरण नहीं ग्रहण करता । वह समस्त युगों में दुःखी ही रहता है और चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ प्रायः त्रिविध तापों से संतप्त होकर बार-बार जन्मता मरता रहता है । जो सब का प्यारा सर्व प्राणियों का आत्म स्वरूप राम है । वह ही सब की रक्षा करने वाला है ॥४७॥
(क्रमशः)

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