शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

विनती कौ अंग ३४ - २७/३१

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज,व्याकरण वेदांताचार्य श्रीदादू द्वारा बगड़,झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज,बगड़ झुंझुनूं । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी ~ विनती कौ अंग ३४ - २७/३१)*
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*दया करै तब अंग लगावै, भक्ति अखंडित देवै ।*
*दादू दर्शन आप अकेला, दूजा हरि सब लेवै ॥२७॥*
भक्ति प्रिय भक्तों पर भगवान् की जब दया होती है तो वह भक्त वर्ग को अखण्ड भक्ति व दर्शन देते हैं तथा उनके अन्तःकरण की वृत्ति को वासना रहित विशुद्ध कर देते हैं और उन के द्वैत को हरण कर लेते हैं ॥२७॥
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*दादू साध सिखावैं आत्मा, सेवा दिढ कर लेहु ।*
*पारब्रह्म सौं विनती, दया कर दर्शन देहु ॥२८॥*
सन्तजन सदा उपदेश करते हैं कि हे साधको ! तुम सब भगवान् राम का दृढ़ निश्चय के साथ भजन किया करो यदि तुम उनके दर्शनों की प्रार्थना करोगे तो वह तुम को अवश्य दर्शन देगा ॥२८॥
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*साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी ।*
*दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥२९॥*
भगवान् और साधु तो दयालु ही होते हैं । संत सब का हित चाहते हैं इसलिये दयालु हैं और परमात्मा अपने दयालु स्वभाव के कारण सब की पालना करते हैं । परन्तु यह जीव ही अभागा है जिसने विद्या को छोड कर अविद्या को अपनाया ॥२९॥
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*सब जीव तोरैं राम सौं, पै राम न तोरे ।*
*दादू काचे ताग ज्यों, टूटै त्यों जोरे ॥३०॥*
संपूर्ण संसार अपने प्रमाद के कारण प्रभु से विमुख होकर अपने अज्ञान से प्रभु के प्रेम सम्बन्ध को तोडता है । परन्तु भगवान् उस प्रेम सम्बन्ध को फिर से जोडते रहते हैं । जैसे कपडा बनाने वाला जुलाहा अपने टूटे हुए तन्तुओं को बार-बार कपडे से जोडता रहता है उसी प्रकार जीव की वृत्ति को फिर से अपने में लगा लेते हैं । क्योंकि उनका स्वभाव दयालु हैं और वह जीवों का उद्धार चाहता हैं ॥३०॥
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*॥ संजीवनी ॥*
*फूटा फेरि संवार कर, ले पहुँचावे ओर ।*
*ऐसा कोई ना मिलै, दादू गई बहोर ॥३१॥*
ऐसा कोई संत नहीं मिल रहा है कि प्रभु दर्शन के अयोग्य विषय प्रवृत्ति वाले इस मन को उपदेश के द्वारा समझा कर फिर प्रभु से जोड दे तथा उस परमात्मा से मिला दे । मेरी इतनी आयु चली गई है अतः हे प्रभो ! ऐसा कोई सद्गुरु मिले जो हमें परमात्मा से मिला दे ॥३१॥
(क्रमशः)

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