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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मन चित मनसा पलक में, सांई दूर न होइ ।*
*निष्कामी निरखै सदा, दादू जीवन सोइ ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
इस अंग में सकाम और निष्काम संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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सहकामी सौंघे सदा, निष्कामी निरमोल ।
जन रज्जब पाये परखि, समझे साधू बोल ॥१॥
सकामी सदा ही सस्ते रहते हैं, निष्कामी सदा अनमोल रहते हैं । समझे हुये संतों के वचनों से हम सकामी निष्कामी जनों की परीक्षा कर पाये हैं ।
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सहकामी संकट सदा, निष्कामी निर्बंध ।
रज्जब आशा नाश ह्वै, अमर अनाशा कंध४ ॥२॥
सकाम को सदा दु:ख ही रहता है । निष्काम बंधन रहित रहता है । जब आशा नष्ट हो जाती है, तब आशा रहित शरीर४धारी ब्रह्म को प्राप्त होकर अमर होता है ।
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आशा उलझी१ आसिरै२, निर आशा निरधार ।
रज्जब व रमति३ रली४, वह रमता की लार५ ॥३॥
आशा युक्त जीवात्मा जन, धन, धामादि का आश्रय२ लेकर उन्हीं में फंस१ जाती है । निराश जीवात्मा निराधार प्रभु परायण होती है । वह आशा युक्त तो संसार-भ्रमण३ करने वाले प्राणियों में मिल४ जाती है और वह आशा रहित सबमें रमने वाले राम के साथ५ हो जाती है अर्थात ब्रह्म को प्राप्त हो जाती है ।
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सहकामी संसार बस, गुड़ी१ रूप उनहार२ ।
जन रज्जब निष्काम के, आभे३ का औतार४ ॥४॥
सकाम पतंग१ के समान२ है, जैसे पतंग उड़ाने पर आकाश में जाकर भी पृथ्वी पर ही बसता है, वैसे ही सकामी उंचा स्वर्गादि में जाकर भी पुन: पृथ्वी पर ही बसता है । निष्कामी बादल३ के जन्म४ के समान है, जैसे बादल आकाश में उत्पन्न होकर आकाश में ही लय हो जाते हैं । वैसे ही निष्कामी ब्रह्म में लय होता है ।
(क्रमशः)
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