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*साँई को मिलबे के कारण,*
*त्रिकुटी संगम नीर नहाई ।*
*चरण-कमल की तहँ ल्यौ लागै,*
*जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद ७१)
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*जतन का अंग १५८*
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स्वाति बूंद राखै शकति, साधु शब्द यूं राखि ।
रज्जब निपजहिं मुक्त मन, सब समझ्यों की साखि ॥९॥
जैसे स्वाति विंदु को शुक्ति यत्न से रखती है, समुद्र में रहने पर भी समुद्र का जल अपने में नहीं आने देती । तब ही मोती श्रेष्ठ बनता है । वैसे ही संतों के शब्दों को रखना चाहिये । सांसारिक वासना मन में नहीं आने देनी चाहिये । तब ही मन ज्ञान युक्त होता है समझे हुये सभी संतों की यही साक्षी है ।
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देही अरु दरियाव का, पाणी परसै नांहि ।
तो मन मोती नीपजै, सुरति१ सीप के मांहि ॥१०॥
जब समुद्र का जल मोती को स्पर्श नहीं करे, तब ही सीप में मोती अच्छा बनता है । वैसे ही शरीर का पानी वीर्य अर्थात काम वासना मन को स्पर्श नहीं करे तब ही ब्रह्माकार वृत्ति१ द्वारा मन श्रेष्ठ बनता है ।
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रे रज्जब आधान के, अबला१ चलै जत्न ।
तो सुत साबत नीपजे, आदम अजब रत्न ॥११॥
गर्भाधान की रक्षा के लिये नारी१ यत्न से चलती है । सब व्यवहार सावधानी से करती है, तब ही पुत्र ठीक तरह उत्पन्न होता है । वैसे ही जो सावधानी पूर्वक साधन से रहता है, वही मनुष्य अदभुत रत्न अर्थात ज्ञानी होता है ।
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रंचक१ रंचक ॠद्धि२ करि, राजा भरहिं भंडार ।
रज्जब बूंद हिं बूंद मिल, होत समुद्र अपार ॥१२॥
बिंदु बिंदु मिलकर समुद्र अपार बन जाता है । किंचित१ किंचित ऐश्वर्य२ से राजा अपना भण्डार भर लेता है वैसे ही थोड़े थोड़े साधन से व्यक्ति को महान ज्ञान होता है ।
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रज्जब जोड्या पषैन१ जुडै खजानूं, नीर रहै तुछ२ तेणि३ नडौ४ ।
शब्द ही शब्द साधु बड़ कहिये, ज्यों बूंद ही बूंद समुद्र बडौ ॥१३॥
पैसा१-पैसा जोड़ने से खजाना जुड़ जाता है । थोड़ा२ थोड़ा जल संग्रह होने पर उससे३ नाडा४(छोटी तलिया) बन जाता है । बिंदु बिंदु करके ही विशाल समुद्र बनता है । वैसे ही शब्दों ही शब्दों के विचार से संत महान कहलाता है ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित जतन का अंग १५८ समाप्तः ॥सा. ४९९५॥
(क्रमशः)
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