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*दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात ।*
*दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*काल पर्यो शत पन्द्रह बीसक,*
*द्वन्द्व मच्यो मरि है सब लोई ।*
*स्वामिन के सु दया मन में अति,*
*देत सदाव्रत आवत कोई ॥*
*पात भयो धन भूमि गड्यो बहु,*
*देत लुटाय न राखत सोई ।*
*कान सुने जितने परिचै कहि,*
*पीपहि के गुन पार न होई ॥१६३॥*
वि. स. १५२० का अकाल पड़ा था, उस समय अन्न की कमी से बड़े उपद्रव होने लगे थे । भूख से सब लोग मर रहे थे ।
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पीपाजी के मन में तो अति दया थी । उन्होंने सदाव्रत देना आरम्भ कर दिया था । सबको भोजन व वस्त्रादि देते थे ।
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उन दिनो भगवत् कृपा से भूमि में गड़ी हुई बहुत-सी धनराशि उनको मिल गई थी । उनने उस को भूखों को खिलाने और वस्त्रादि देने में खर्च कर दिया था । पास कुछ भी रक्खा था ।
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जितने उनके चरित्रों का परिचय हमको अपने श्रवणों से सुनने को प्राप्त हुआ है, वे सब तो कह दिये हैं । बाकी पीपाजी के गुण तो अपार हैं, उनका पार तो कौन पा सकता है ।
(क्रमशः)
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