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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१८. साध को अंग ~ १०९/११२*
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मांगि कह्यां मांगौ भगति, द्रवौ दया करि रांम ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, सतसंगति हरि नांम ॥१०९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अगर प्रभु कुछ मांगने को कहे तो भक्ति मांगे और कहे कि हे प्रभु आप दया करें यह ही प्रेम रस है और परमात्मा से सत्संगति मांगे व प्रभु स्मरण मांगे ।
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सकल बस्तु११ का मूल हरि, रांम नांम आधार ।
कहि जगजीवन साध सब, एही अरथ बिचार ॥११०॥
(११. बस्तु=लौकिक पदार्थ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी वस्तु का मूल या उद्गम हरि है और आधार राम नाम है । सभी संत ऐसा ही विचारकर नाम स्मरण में ही लगे रहते हैं ।
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उर मंहि अबिगत एक तत, आनंद रूपी नांम ।
कहि जगजीवन साध कै, अलख निरन्जन रांम ॥१११॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन के ह्रदय में एक परम तत्त्व जिसका नाम आनंद है रहता है । और उन अलख निरंजन परमात्मा का नाम ही रहता है ।
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उभै अबंध१ दोइ सदा फल, बिरष बेलि बिन जांम ।
कहि जगजीवन साध हरि, निरभै निहचल ठांम ॥११२॥
(१. अबंध=न बाँधने योग्य)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भागवत व भगत दोनों फल, बिना वृक्ष व बेल के जन्मते हैं । संत कहते हैं कि साधु जन व प्रभु भी निर्भय व निश्चल हो एक स्थान पर रहते हैं ।
(क्रमशः)
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