गुरुवार, 9 सितंबर 2021

*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०(५/८)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥*
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*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०*
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सुकृत१ फल है प्रवृत्ति मध्य, निवृत्ति नाम निरधार ।
सत२ जत३ को यहु आसिरा४, रज्जब समझ विचार ॥५॥
प्रवृत्ति में पुण्य१ कर्म रूप फल प्राप्त होता है और निवृत्ति नाम चिन्तन द्वारा निराधार प्रभु की प्राप्ति रूप फल मिलता है । सदगृहस्थ२ और साधु३ को यह सुकृत और नामचिंतन रूप साधन का ही आश्रय४ है । यह विचार द्वारा तुम भी समझ सकते हो ।
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सुकृत फल सु प्रवृत्ति मध्य, निवृत्ति नाम निराट१ ।
नर नारायण मुख चढे, आये एक२ हिं बाट३ ॥६॥
प्रवृत्ति में सुकृत फल प्राप्त होता है, निवृत्ति में एकमात्र१ नामचिंतन द्वारा प्रभु प्राप्ति रूप फल मिलता है । जिन प्रवृत्ति परायण नरों के पदार्थ यदि नारायण के मुख रूप संतों के समर्पण हुये हैं वे भी एकता२ रूप मार्ग में ही आये हैं, अर्थात अंत में दोनों ही अद्वैतावस्था३ में ही आ जाते हैं ।
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शिव तरुवर छाया शकति१, जुगल माहात्म्य जान ।
रज्जब जानी पंखि जन, फल पावै किस थान ॥७॥
वृक्ष और छाया दोनों का माहात्म्य पक्षी जानते हैं उन्हें ज्ञात रहता है कि फल किस स्थान पर मिलता है अर्थात वृक्ष में मिलता है छाया में नहीं, छाया में तो आतप ही शांत होता है । वैसे ही ब्रह्म और माया१ का माहात्म्य भक्त जानते हैं उन्हें ज्ञात रहता है । अक्षय सुख रूप फल कहां मिलता है, ब्रह्म चिंतन द्वारा ही मिलता है । माया से तो नष्ट होने वाला सुख ही मिलता है । यही प्रवृत्ति और निवृत्ति के फल का भेद है ।
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धरणी धरै सो वित्त१ ले, तरु नर धरहि अकाश ।
सो परमारथ में पडैं२, जन रज्जब निज दास ॥८॥
जो पृथ्वी में धन रखते हैं वे तो वह रक्खा हुआ धन१ ही प्राप्त करते हैं किंतु जैसे वृक्ष अपने फल रूप धन को आकाश में रखते हैं तो वह परमार्थ में लग२ जाता है । वैसे ही भगवान के निजी भक्त नर ब्रह्म के समर्पण कर देते हैं वह परमार्थ में ही लगता है ।
(क्रमशः)

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