🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*साचे को
साचा कहै, झूठे को झूठा ।*
*दादू दुविधा
को नहीं, ज्यों था त्यों दीठा ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं.
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार
विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)श्रीरामकृष्ण
तथा नरेन्द्र । हाजरा की कथा*
नरेन्द्र -
(श्रीरामकृष्ण से) - हाजरा अब भला आदमी हो गया है ।
श्रीरामकृष्ण
- तुम नहीं जानते कि लोग ऐसे भी होते हैं जिनके मुँह में तो रामनाम रहता है पर बगल
में छुरी होती है ।
.
नरेन्द्र -
महाराज, इस बात में मैं आपसे सहमत नहीं हूँ । मैंने स्वयं उससे
उन बातों की जाँच की जिनके बारे में लोग शिकायत करते हैं, पर
उसने साफ इन्कार किया ।
.
श्रीरामकृष्ण
- वह भक्ति में जरूर दृढ़ है । थोड़ा-बहुत जप भी करता है, पर कभी कभी उसका व्यवहार विचित्र होता है । गाड़ीवाले का भाड़ा नहीं देता ।
नरेन्द्र -
महाराज, नहीं, ऐसी बात नहीं है । वह कहता
था, उसने दे दिया है ।
श्रीरामकृष्ण
- उसके पास पैसा कहाँ से आया ?
नरेन्द्र -
रामलाल अथवा और किसी ने दिया होगा ।
.
श्रीरामकृष्ण
- क्या तुमने उससे सब बातें विस्तारपूर्वक पूछी थीं ? एक बार मैंने जगदम्बा से प्रार्थना की थी, 'माँ !
यदि हाजरा ढोंगी है, तो बड़ी कृपा होगी यदि तुम यहाँ से उसे
हटा दो ।' उसके बाद मैंने हाजरा से कह भी दिया था कि मैंने
तुम्हारे बारे में माँ से ऐसी प्रार्थना की है ।
.
थोड़े दिनों
बाद वह फिर आया और मुझसे कहा, 'देखिये, मैं
तो अब भी यहाँ बना हूँ ।' (श्रीरामकृष्ण तथा अन्य सब हँसे)
पर शीघ्र ही कुछ दिनों बाद उसने यहाँ आना बन्द कर दिया । "हाजरा की बेचारी
माँ ने मेरे पास रामलाल द्वारा कहलाया कि मैं हाजरा से कह दूँ कि वह कभी कभी जाकर
अपनी बूढ़ी माँ को देख आया करे ।
.
वह बेचारी
करीब करीब अन्धी ही थी और रोती रहती थी । मैंने हाजरा को तरह तरह से समझाया कि वह
जाकर देख आया करे । मैंने उससे कहा, 'देखो, तुम्हारी माँ वृद्धा है, कम से कम उसे एक बार जाकर
तो देख आओ ।' पर मेरे कहने पर भी नहीं गया । अन्त में वह
बेचारी बुढ़िया रोते रोते मर गयी ।”
नरेन्द्र -
पर इस बार वह घर जायेगा ।
.
श्रीरामकृष्ण
- हाँ हाँ, मुझे मालूम है वह घर जायेगा । वह बड़ा दुष्ट है,
धूर्त है, तुम उसे नहीं जानते । गोपाल कहता था
कि हाजरा सींती में कुछ दिन रहा था । लोग उसके लिए घी लाते थे, चावल लाते थे और भी तरह तरह की खाद्य-सामग्री उसे लाकर देते थे, पर उसकी उद्दण्डता तो देखो कि वह उन लोगों से कह देता था, 'मैं ऐसा मोटा चावल नहीं खा सकता । मुझे ऐसा खराब घी नहीं चाहिये ।'
भाटपारा का ईशान भी उसके साथ गया था । उसने ईशान से कहा, 'शौच के लिए पानी ले आओ ।' इससे वहाँ के अन्य
ब्राह्मण उससे बहुत नाराज हो गये थे ।
.
नरेन्द्र –
मैंने उससे वह बात पूछी थी । वह कहता था, ईशान बाबू मेरे लिए
खुद पानी लाये थे और इतना ही नहीं, वह कहता था कि भाटपारा के
बहुत से ब्राह्मण लोग भी उसे मान देते हैं और श्रद्धा करते हैं ।
.
श्रीरामकृष्ण
(मुसकराते हुए) - वह सब उसके जप और तपस्या का फल था । जानते हो, मनुष्य की शारीरिक बनावट भी उसके चरित्र पर अपना बहुत प्रभाव डालती है ।
नाटा कद और शरीर में इधर-उधर गड्ढे या कूबड़ अच्छे लक्षण नहीं हैं । जिन लोगों के
ऐसे लक्षण होते हैं उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने को बहुत समय लगता है ।
.
भवनाथ - खैर
महाराज, जाने दीजिये इन बातों को ।
श्रीरामकृष्ण
- नहीं, मुझे गलत न समझना । (नरेन्द्र से) तुम कहते हो कि
तुम्हें लोगों की पहचान है, इसीलिए यह सब तुम्हें बता रहा
हूँ । जानते हो, हाजरा-ऐसे लोगों को मैं किस दृष्टि से देखता
हूँ ?
.
"जिस
प्रकार ईश्वर सत्पुरुषों के रूप में अवतार लेता है उसी प्रकार वह धोखेबाज और
दुष्टों के रूप में भी अवतीर्ण होता है । (महिमाचरण से) क्यों, तुम्हारी क्या राय है ? वैसे तो सभी ईश्वर हैं ।
महिम - हाँ
महाराज, सभी ईश्वर हैं ।
(क्रमशः)

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