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*आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट ।*
*दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)श्रीमुखकथित चरितामृत*
श्रीरामकृष्ण - (मणि से) - जब ईश्वर भक्तों के लिए शरीर धारण करके आते हैं, तब उनके साथ साथ भक्त भी आते हैं । उनमें कोई अन्तरंग होते हैं, कोई बहिरंग, और कोई रसददार(आवश्यकताओं को पूरी करनेवाले) होते हैं ।
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"दस ग्यारह साल की उम्र में विशालाक्षी के दर्शन करने के लिए जब मैं गया था, तब मैदान में मेरी पहली भावावस्था हुई थी । कितनी सुन्दर अवस्था थी वह ! मैं बिलकुल बाह्यज्ञान शून्य हो गया था ।
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“जब बाईस-तेईस साल की उम्र थी तब उसने(जगन्माता ने) मुझसे कालीघर (दक्षिणेश्वर) में पूछा - 'क्या तू अक्षर होना चाहता है ?" मैं अक्षर का अर्थ जानता ही न था । पूछने पर हलधारी ने बतलाया, 'क्षर का अर्थ है जीव और अक्षर का अर्थ है परमात्मा ।'
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“जब आरती होती थी, तब मैं कोठी के ऊपर से चिल्लाता था, 'अरे भक्तो, तुम सब कहाँ हो ? आओ, जल्दी आओ । सांसारिक मनुष्यों के बीच में मेरे प्राण निकले जा रहे हैं ।' इंग्लिशमैनों(अंग्रेजी पढ़े आदमियों) से अपना हाल कहा तो उन्होंने बतलाया, 'यह सब मन की भूल है ।' तब, अपने मन में यह कहकर 'शायद ऐसा ही हो' मैं चुप हो गया । परन्तु अब तो वह सब ठीक उतर रहा है । - अब भक्त आकर एकत्रित हो रहे हैं ।
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"फिर माँ ने दिखलाया, पाँच आदमी सेवा करनेवाले हैं । पहला मथुरबाबू है । फिर शम्भु मल्लिक, उसे पहले मैंने कभी नहीं देखा था । भावावेश में मैंने देखा, गोरे रंग का आदमी, सिर पर टोपी पहने हुए । जब बहुत दिनों बाद शम्भु को देखा, तब याद आ गया कि इसी को मैंने भावावस्था में देखा था । सेवा करनेवाले और तीन आदमी अभी ठीक नहीं हुए; परन्तु सब गोरे रंग के हैं ।
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सुरेन्द्र बहुत करके रसददार की तरह जान पड़ता है । यह अवस्था जब हुई, तब ठीक मेरी तरह का एक आदमी आकर मेरी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों को खूब हिला गया । षड्चक्रों के एक-एक पद्म के साथ जिव्हा के द्वारा रमण करता था, ऐसा करने से ही वे अधोमुख पद्म ऊर्ध्वमुख हो गये । अन्त में सहस्रार पद्म विकसित हो गया ।
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"कब किस तरह का आदमी आयेगा, यह पहले ही से माँ मुझे दिखा देती थीं । इन्हीं आँखों से मैं देखा करता था - भावावेश में नहीं । मैंने देखा, चैतन्यदेव का संकीर्तन बकुल वृक्ष से वट वृक्ष की ओर जा रहा है। उसमें मैंने बलराम को देखा था और शायद तुम्हें भी देखा था । मेरे पास बार बार आने से तुममें और चुन्नी में आध्यात्मिक जागृति हुई है ।
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"शशी और शरद को देखा था, ये ईशु के दल में थे ।
"वट वृक्ष के नीचे एक बच्चे को देखा था । हृदय ने कहा, 'तब तो तुम्हारे एक लड़का होगा ?' मैंने कहा, 'मेरे लिए तो सब मातृयोनि है, मेरे लड़का कैसे होगा ?" वह लड़का राखाल है ।
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"मैंने कहा, ‘माँ, जब तुमने मेरी ऐसी ही अवस्था कर दी है तब एक बड़ा आदमी भी मिला दो ।’ इसीलिए मधुरबाबू ने चौदह वर्ष तक सेवा की । और उसने कितना किया ! - साधुओं की सेवा के लिए अलग भण्डार कर दिया; गाड़ी, पालकी, जो वस्तु जिसे देने के लिए मैं कहता था, वह तुरन्त दे देता था ! ब्राह्मणी उसे प्रताप रुद्र* कहती थी । (*प्रताप रुद्र उड़ीसा के राजा तथा श्रीचैतन्य महाप्रभु के भक्त थे । उन्होंने श्रीचैतन्य देव की अत्यन्त श्रद्धा तथा भक्ति के साथ सेवा की थी ।)
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"विजय ने इस रूप के (अपनी ओर इंगित कर) दर्शन किये थे । अच्छा, यह क्या है ? - वह कहता है, तुम्हें इस समय छूने पर जैसा अनुभव होता है, वैसा ही मुझे उस समय हुआ था ।
“लाटू ने गिना, इकतीस भक्त हैं । इतने तो बहुत नहीं हुए । पर हाँ, कुछ भक्त विजय तथा केदार के द्वारा भी बन रहे हैं ।
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“भावावेश में माँ ने दिखलाया, अंतिम दिनों में मुझे पायस खाकर ही रहना होगा ।
“इस बिमारी में वह(श्रीरामकृष्ण की धर्मपत्नी) मुझे एक दिन पायस खिला रही थी । तब यह कहकर मैं रोने लगा, ‘क्या यही मेरा अंतिम दिनों का पायस खाना है, और इतने कष्टपूर्वक !’”
(क्रमशः)

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