मंगलवार, 28 मई 2024

*सेवग स्वामी पारिख कौ अंग*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू स्वांग सगाई कुछ नहीं, राम सगाई साच ।*
*साधू नाता नाम का, दूजै अंग न राच ॥*
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*सेवग स्वामी पारिख कौ अंग ॥*
असली साध त्यांह का सेवग भी असली,
त्याँह तौ क्यूँ येक टाली ।
जिसा देव तिसा पुजारा, तिनकी बात निराली ॥७॥
जो साधु असली = मात्र वेषधारी ही नहीं ब्रह्मनिष्ठ भी होते हैं, उनके शिष्य भी असली ही = एक परब्रह्म परमात्मा मात्र के आराधक न कि अनेकों देवी-देवों के उपासक होते हैं । उनमें से एक भी नकली न होने के कारण एक भी टालने योग्य नहीं होता । वस्तुतः जैसे देवता होते हैं वैसे ही पुजारी भी होते हैं । इन ब्रहमनिष्ठ गुरु-शिष्यों की तो बात ही निराली = विलक्षण होती है ॥७॥
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*पाषंडी पारिख कौ अंग ॥*
गुंजाहली गर्ब करि बोली । जे सोना की सरभरि तोली ।
घण बैसंदर पैसि न आवै । कालै मुँहड़ै काँइ पमावै ॥८॥
सोने को तोलने में काम आने वाली लाल रंग की चिरमी(गुंजाहली) सोने के साथ तुलकर गर्व करते हुए बोली कि मैं भी सोने के समान ही मूल्यवान हूँ । मुझे भी मस्तक पर धारण करो किन्तु गुंजाहली को अग्नि में तपाने पर वह निश्शेष हो जाती है जबकि सोना तपाने पर और अधिक चमकदार और पवित्र हो जाता है । बताइये, काले मुँह वाली = नकली (सोने की सापेक्षकता से) चिरमी बाजार में क्या मूल्य पमावै = प्राप्त कर सकती है ॥८॥
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दाई आगै पेट छिपावै, कारण होइ न छानौं ।
बिन परचै परचा कहै, बषनां ताकी बात न मानौं ॥९॥
कोई गर्भवती महिला यदि अपने गर्भ के बारे में दाई से छिपाना चाहे तो कारण = गर्भ को छिपाया जाना असंभव है क्योंकि एक न दिन तो उसे दाई की शरण में जाकर शिशु को उदर से बाहर लाना ही होगा । बषनांजी कहते हैं, जो गुरु उपदेशक बिना आत्मसाक्षात्कार के ही आत्मसाक्षात्कार की बातें कहते हैं, उनकी बातों को मैं मानने को तैयार नहीं हूँ ॥९॥
इति अणपारिख पारिख समिता कौ अंग संपूर्ण ॥अंग १११॥साषी २१४॥
(क्रमशः)

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