शुक्रवार, 17 मई 2024

*अग्यान समिता पारिख कौ अंग ॥*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू सैन्धव फटिक पाषाण का, ऊपर एकै रंग ।*
*पानी मांहैं देखिये, न्यारा न्यारा अंग ॥*
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*अग्यान समिता पारिख कौ अंग ॥*
धौलौ दूध छाछि भी धौली, धौलौ सिंधम माणी ।
परष पषैं सगला सारीखा, बषनां बिगति न जाणी ॥१॥
दूध श्वेत रंग का होता है, छाछ सफेद रंग की होती है तो नमक भी माणी = समान सफेद रंग का ही होता है । बषनांजी कहते हैं, पषैं = बिना पहचान के श्वेत रंग के होने से तीनों ही समान लगते हैं क्योंकि दृष्टा ने उनका विशिष्ट विगति = परिचय नहीं जाना ॥
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ज्ञान दो प्रकार का होता है (१) सामान्य (२) विशिष्ट । इदमाकार ज्ञान सामान्य ज्ञान होता है । जैसे सामने कोई पुरुष खड़ा है । यहाँ केवल इतना सा ज्ञान होता है कि सामने कोई व्यक्ति खड़ा है । यथार्थ में वह राम है अथवा और कोई इसका निश्चय नहीं होता है ।
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विशिष्टज्ञान में व्यक्ति का निश्चय ज्ञान उसका नाम व विशेषताएं जानकर होता है जैसे उसका नाम राम व वह एक आँख से अंधा है । अतः निश्चय हुआ जिसका नाम राम है और जिसकी एक आँख अंधी है, वही राम है । यहाँ पर बिना विशेष विवरण जानने का तात्पर्य बिना विशिष्ट ज्ञान के ही है । सफेद का ज्ञान सामान्य ज्ञान है क्योंकि यह तत्व सभी में समान रूप से व्याप्त है ॥१॥
(क्रमशः)

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