गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

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*दादू कहै, तन मन तुम पर वारणैं,*
*कर दीजे कै बार ।*
*जे ऐसी विधि पाइये, तो लीजे सिरजनहार ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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*अहोभाव *
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रैदास कहते हैं कि जो भी परमात्मा के दरवाजे पर दुखी की तरह गया, दरदमंद की तरह गया, कुछ मांगने गया, भिखमंगे की तरह गया, उसे कोई उत्तर नहीं मिला। उसकी प्रार्थना व्यर्थ चली गई। *बहुतै प्‍यास जबाब न पाया*
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चाहे कितनी ही उसकी प्यास हो, उसको जवाब नहीं मिलेगा। क्योंकि अभी भी वह परमात्मा से अपना ही काम लेना चाहता है। अभी अहंकार मिटा नहीं। अहंकार परमात्मा का भी शोषण करना चाहता है। वह कहता है, ऐसा करो मेरे लिए; मैं कहता हूं, ऐसा करो ! वह अभी भी परमात्मा पर समर्पित नहीं है। वह यह नहीं कहता कि जो तेरी मर्जी। *कहि रविदास सरनि प्रभु तेरी*
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रैदास ने कहा हमने तो ऐसे पाया। हमने कैसे पाया वह हम बताए देते हैं। हमने ऐसे पाया कि हमने कहा, सरनि प्रभु तेरी, हम तेरी शरण हैं ! ज्यू जानहु—तुम जैसा जानते हो— त्युं करु गति मेरी। तुम्हारी जो मर्जी हो वैसी मेरी गति करो। तुम मुझे नरक भेज दो तो भी मैं आनंदित, नाचता हुआ जाऊंगा, क्योंकि तुमने भेजा जो। मैं स्वर्ग नहीं मांगता। नरक की अग्नि मेरे लिए शीतल हो जाएगी, क्योंकि तुमने भेजा जो। मांगा स्वर्ग मेरे काम का नहीं। बिन मांगे तुम जो दे दोगे, वही मेरा स्वर्ग है।
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रैदास कहते हैं उसके द्वार पर कोई मांग लेकर मत जाना। और तुम सब मांग लेकर ही जाते हो। तुम्हारी जब कोई मांग होती है तभी तुम प्रार्थना करते हो। प्रार्थना शब्द का अर्थ ही मांग हो गया है। इसलिए मांगने वाले को प्रार्थी कहते हैं—कुछ मांगने आया।
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प्रार्थना का अर्थ मांग नहीं है। प्रार्थना का अर्थ दान है। प्रार्थना का अर्थ समर्पण है। प्रार्थना का अर्थ है : मैं तुम्हारी शरण आया। जैसा बुरा— भला हूं स्वीकार कर लो। और जो तुम्हारी मर्जी हो, क्योंकि तुम जानते हो, मैं क्या जानता हूं ! जहां चलाओ, चलूंगा। जहां उठाओ, उठूंगा। जहां बिठाओ, बैठूंगा।
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रैदास जूते सीते और बेचते। और उनके पास मीरा जैसी शिष्या ! और भी बहुत शिष्य, हजारों शिष्य थे रैदास के, वे उनसे कहते कि अच्छा नहीं लगता कि आप जूते सीएं। वे जूता सीते रहते और ज्ञानचर्चा भी चलाते रहते, ब्रह्मचर्चा भी चलाते। वे कहते, जंचता नहीं, अच्छा नहीं लगता। आप और जूता सीएं ! और हम सबके रहते ! हम सब करने को राजी हैं।
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रैदास उनसे कहते जब तक उसकी मर्जी जूता सिलाने की है, मैं क्या करूं ? वह तो कहता ही नहीं कि रैदास, जूता सीना बंद कर। वह तो जब भी कहता है, यही कहता है कि तेरे जूते मुझे बहुत पसंद आते हैं। जो भी मेरे जूते पहनता है वह राम ही तो है ! कितने राम आकर मुझसे कह गए कि तुम्हारे जूते हमें बहुत पसंद आते हैं। ऐसे सुंदर जूते कोई नहीं बनाता। कैसे बंद कर दूं !
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उसकी मर्जी होगी तो बंद हो जाएगा। उसकी मर्जी है तो जारी रहेगा। अगर जन्मों—जन्मों तक भी वह भेज कर मुझसे जूते सिलवाता रहे तो भी मैं आनंद से सीता रहूंगा। गाते गीत, सीते जूते। गुनगुनाते राम को, सीते जूते। ऐसे जो आता है प्रभु के द्वार पर वही स्वीकार होता है, वही प्रवेश कर पाता है। प्रार्थना का सार सूत्र है : जो तेरी मर्जी है वह पूरी हो।
ओशो ~ मन ही पूजा मन ही धूप

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