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*जब निराधार मन रह गया,*
*आत्म के आनन्द ।*
*दादू पीवे रामरस, भेटे परमानन्द ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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प्रश्नः ओशो, मैं आपको सुनते-सुनते सो जाता हूं; पता नहीं यह तारी है या खुमारी है, या केवल साधारण निद्रा मात्र है। प्रकाश डालने की कृपा करें ! धर्मदास ! भैया, तारी या खुमारी तो जरा मुश्किल है। निद्रा ही होगी। तारी और खुमारी होती तो प्रश्न उठता ही नहीं। लेकिन कुछ चिंता न लेना।
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धर्म-सभा का यह नियम है। वहां जो न सोए सो नासमझ है। समझदार तो गहरी निद्रा लेते हैं। यही तो अवसर है सोने का। रात इत्यादि तो दूसरे कामों के लिए बनी है..चिंताएं हजार, सपनों की भीड़, कहां फुर्सत है ! धर्म-सभा ऐसी जगह है..न चिंता, न फिकर; न घर, न द्वार; न पत्नी, न बच्चे, एकदम निश्चिंत ! ऐसा अवसर कौन छोड़े ! लोग घुर्राटे लेते हैं।
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मैं तो बहुत से डाक्टरों को जानता हूं। अनिद्रा के रोगियों को वे कहते हैं: भैया, धर्म-सभा में जाओ ! अगर कोई और शामक दवा काम न करे तो फिर यह दवा जरूर काम करती है। और धर्मदास, मैं तुम्हें जानता हूं, भलीभांति पहचानता हूं; सो सौ प्रतिशत नींद ही है।
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मैटरनिटी हास्पिटल के जनरल वार्ड से नर्स गोद में एक काला-कलूटा, अधमरा सा बच्चा लिए बाहर निकली। बाहर खड़े अनेक व्यक्तियों के बीच से नसरुद्दीन जोर से बोला: सिस्टर, यह बच्चा मेरा है ! नर्स को तो बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोलीः मगर नसरुद्दीन, तुमने पहचाना कैसे कि यह तुम्हारा ही बच्चा है ? नसरुद्दीन बोला: अजी, मैं अपनी बीबी को अच्छी तरह जानता हूं, जो भी चीज बनाती है ऐसा ही जला-भुना देती है।
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सो धर्मदास, मैं तुम्हें जानता हूं। खुमारी, समाधि..इस झंझट में तुम न पड़ोगे। तुम तो मजे से सो रहे होओगे। और नाम ही तुम्हें धर्मदास का किसलिए दिया है ? धार्मिक हो। और धार्मिक आदमी और करे क्या ! दर्शन को भी तुम आते हो तो मैं चकित होता हूं कि कैसे चले आ रहे हो ! नींद तुम्हारी ऐसी गहरी है।
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मगर कुछ लोग नींद में भी चलते हैं। सौ में से दस प्रतिशत लोग नींद में चल सकते हैं, मनोवैज्ञानिक कहते हैं। नींद में उठते हैं, काम भी कर लेते हैं, फिर सो जाते हैं। जाकर किचन में टटोल कर कुछ खा-पी आते हैं, फिर सो जाते हैं। और सुबह उनसे पूछो, उन्हें कुछ याद नहीं है। नींद में चलना संभव है।
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तुम्हें जब देखता हूं आते, तो मैं सोचता हूं: ये चले आ रहे, चमत्कार! सब सोया है तुम्हारे भीतर। तुम्हें देख कर मुझे नींद का ही पहले ख्याल आता है। असल में तुम अगर ज्यादा मेरे साथ सत्संग करो तो तुम्हारे जगने की कम संभावना है, मेरे सो जाने की ज्यादा है। तुम्हारा अभ्यास गहरा है।
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कई संन्यासी अपने बच्चों को संन्यास लिवाने ले आते हैं। जब तक उनका नाम पुकारा जाए, तब तक बच्चे सो जाते हैं। तो बेचारे पिता या मां थोड़े से हतप्रभ होते हैं, कहते हैं क्षमा करें ! मैं कहता हूं: तुम बिल्कुल फिकर मत करो। यह मेरा रोज का ही काम है..सोए लोगों को ही संन्यास देना है। ये बच्चे तो बेचारे सच्चे हैं, सो मजे से सो रहे हैं। बाकी चालबाज हैं, आंख भी खोले हैं और सो भी रहे हैं।
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कुछ लोग हैं जिनको आंख खोल कर भी सोने का अभ्यास होता है। एक महिला को तो मैं जानता हूं कि वे आंख खोल कर सो सकती हैं। उनको मैंने आंखें खोले सोए हुए देखा है। जब वे कभी मेरे घर आकर मेहमान होती थीं, तो मैं छोटे बच्चों को डराने के लिए उनका उपयोग करता था कि जब भी वे सोएं, बच्चों को भेजूं कि जरा अंदर जाकर तो देखो क्या हो रहा है। बच्चे देखें कि नींद भी लगी है, घुर्राटा भी चल रहा है..और आंखें भी खुली हैं !
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ढब्बू जी को पेंटिंग का शौक था। एक दिन उन्होंने अपने मित्र डाक्टर को पेंटिंग दिखाने के लिए बुलाया। सूर्योदय और सूर्यास्त, वृक्षों और पक्षियों के चित्र देख कर तो डाक्टर पर कोई असर पड़ा नहीं; यद्यपि वे चित्र बहुत खूबसूरत थे। फिर आया एक बूढ़ी दुबली-पतली स्त्री का दृश्य। डाक्टर की आंखें उस पर गड़ी रह गईं।
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ढब्बू जी को थोड़ी राहत मिली, वे खुशी से बोले: मुझे अपनी बनाई हुई सभी कला कृतियों में यही सर्वश्रेष्ठ लगती है..बुढ़ापे के दुख की कथा, हताशा और पीड़ा चेहरे की झुर्रियों में स्पष्ट झलक आई है। आपका इस चित्र के संबंध में क्या ख्याल है ? डाक्टर ने गंभीर स्वर में अपनी राय पेश कीः आप मानें या न मानें, ढब्बू जी, मुझे तो पूरा विश्वास है, इस बुढ़िया को टी.बी. है।
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धर्मदास, तुम्हें नींद की बीमारी है। तुम जब सोते हो, तब तो तुम सोते ही हो; जब तुम जागे हो, तब भी तुम सोए हो। लेकिन कल चर्चा सुन कर..तारी, खुमारी..ये शब्द तुम्हारे कानों में पहंुच गए होंगे नींद में। तुमने सोचा होगा: हो न हो, यह भी खूब रही ! हमें तारी लगती रही अब तक और हम नींद समझते रहे !
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आदमी को सुंदर-सुंदर व्याख्याएं मिल जाएं अपनी बीमारियों की, तो उनको, बीमारियों को ढांक लेने की कोशिश करने में लग जाता है। लोग अपनी विक्षिप्तता को धर्म कह सकते हैं। लोग अपनी मूढ़ता को धर्म बना लेते हैं। लोग अपनी निद्रा को भी समाधि कह सकते हैं। लोग चाहते हैं अच्छे शब्द। अहंकार ऐसा आतुर है !
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एक सज्जन हैं, उनको मिर्गी की बीमारी है तो बेहोश हो जाते हैं, मुंह से फसूकर गिरने लगता है। वे मेरे पास आए और कहने लगे कि मैं रामकृष्ण का जीवन पढ़ रहा हूं, तो उसमें ऐसा आता है कि वे भी बेहोश हो जाते थे और मुंह से फसूकर गिरता था, तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि वही अवस्था मेरी भी है और लोग गलती से समझ रहे हैं कि मुझे मिर्गी की बीमारी है !
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उनकी आंखें देख कर मुझे लगा कि कैसे सच इनसे कहूं, बड़ी चोट लगेगी। उनका चेहरा बिल्कुल ऐसा, लार टपकी जा रही, कि मैं कह दूं कि हां यही बात है। मगर मैं यह भी तो कैसे कहूं ! मगर उनकी उत्सुकता यही है कि अगर मैं कह दूं कि हां तुम्हें भी वही अवस्था आ गई जो रामकृष्ण की थी, तो वे इतने आनंदित होंगे कि उनके आनंद का कोई हिसाब न होगा। फिर वे घोषणा करेंगे दुनिया में कि हां गुरु है अगर कोई सच्चा तो यह।
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लोगों को सत्य से प्रयोजन नहीं है। लोगों को सांत्वना मिले, ऐसी बातों से प्रयोजन है, चाहे वह असत्य ही क्यों न हो। और सच यही है कि असत्य से ज्यादा सांत्वना मिलती है सत्य की बजाय। सत्य तो झकझोर देता है। सत्य तो कड़वा लगता है। बुद्ध ने कहा है: सत्य पहले कड़वा लगता है, फिर मीठा। और असत्य पहले मीठा लगता है, फिर कड़वा। असत्य पर शक्कर की पर्त चढ़ाई जा सकती है, सत्य पर नहीं चढ़ाई जा सकती। सत्य तो जैसा है, नग्न, वैसा ही होता है।
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एक धर्मगुरु अपना व्याख्यान दे रहे थे। मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी गुलजान सामने वाली पंक्ति में ही बैठे हुए थे। तभी धर्मगुरु ने देखा कि मुल्ला की पत्नी तो वहीं बैठे-बैठे ही आंख बंद करके घुर्राटे लेने लगी है। धर्मगुरु ने थोड़ी तो बेचैनी प्रकट की, कसमसाया, फिर भी शांत रहा। थोड़ी देर बाद मुल्ला ने अपनी छड़ी उठाई, अपनी टोपी सीधी की और उठ कर चलता बना।
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धर्मगुरु को यह तो बहुत बुरा लगा कि कोई उठ कर चला जाए। वह तो खैर ठीक कि कोई सो जाए, मगर उठ कर चला जाना किसी का, धर्मगुरु को बहुत अखरा। धर्म-सभा के अंत में उन्होंने मुल्ला की पत्नी से कहा कि देख, तू व्याख्यान के बीच सो गई सो ठीक, मगर तेरे पति को क्या हुआ ? मैंने ऐसा क्या कहा कि वह उठ कर ही चला गया ? गुलजान बोलीः महोदय, आप चिंता न करें। दरअसल उन्हें नींद में चलने की आदत है।
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धर्मदास, नींद ही होगी। तारी तो साधनी पड़ेगी, साधना करनी होगी। तारी तो तब लगेगी जब दशम द्वार के करीब पहुँचोगे। जब सहस्रदल कमल पहली बार खुलने लगेगा तब तारी लगेगी। और जब खुल जाएगा तो खुमारी। तारी शुरुआत है, खुमारी अंत है। ये समाधि के दो अंगः तारी पहला कदम और खुमारी अंतिम। लेकिन लग सकती है तारी।
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जब नींद लग सकती है तो तारी भी लग सकती है। जिंदा हो, इत्ता तो पक्का है। जिंदा न होओ तो सो भी नहीं सकते। मुर्दा कहीं सोते हैं ! जिंदा हो इतना तो पक्का है; नींद से इतनी खबर मिलती है। नींद लग सकती है तो जागरण भी हो सकता है। नींद में ही जागरण की क्षमता छिपी है। नींद के ही आवरण में जागरण छिपा है। जैसे बीज के खोल के भीतर फूल छिपे हैं।
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तो घबड़ाओ मत। मगर झूठे आश्वासन भी मत मांगो। मैं आखिरी आदमी हूं जो तुम्हें कोई आश्वासन दे सकूं। मैं तो कोई अवसर नहीं चूकता, जब कि मैं चोट कर सकूं तो जरूर करता हूं। बिना चोट किए तुम जग नहीं सकते। अब एक बात पक्की है कि इतनी बातें तुमने जग कर सुनी होंगी। यह बात बिल्कुल पक्की है कि धर्मदास अभी नहीं सो सकते।
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अभी कैसे सोएंगे ! अभी तो उनकी जान पर गुजर रही होगी कि यह मारा, कि यह मारा ! कि भीतर ही भीतर कह रहे होंगे कि किस दुर्घड़ी में यह प्रश्न पूछ लिया ! अभी नहीं सो सकते। अगर अभी सो रहे होओ तो बोलो। अभी नहीं सो सकते। अभी तो बिल्कुल जगे होओगे। अभी तो एकदम जाग गए होओगे। चोट पड़ेगी बार-बार तो जागने लगोगे।
~आचार्य रजनीश ओशो
🪔🩵🙏🏾🩵🪔
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