बुधवार, 5 नवंबर 2025

*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग ५/८*

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*८. नारी पुरुष श्लेष को अंग ५/८*
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जाकै घर नारी भली, सुन्दर ताकै चैंन । 
जाकै घर में करकसा, कलह करै दिन रैंन ॥५॥
(यह साषी भी द्वयर्थक है; क्योंकि इस में 'घर' एवं 'नारी'- ये दोनों शब्द शिलष्टार्थक हैं । 'नारी' के प्रसङ्ग में 'घर' का अर्थ होगा - भवन, एवं 'नाडी' के प्रसङ्ग में 'घर' का अर्थ होगा – शरीर ।)
१. जिस पुरुष को अपनी घर-गृहस्थी चलाने के लिये भली(सुलक्षणा) पत्नी मिली हो, समझ लो कि उस घर में सभी प्रकार से सुख चैन रहेगा; परन्तु दौर्भाग्यवश जिसके घर में कुलक्षणा(कर्कशा) स्त्री आ जाय तो वह उस घर में रात दिन एक न एक नया कलह करती रहेगी ।
२. जिस पुरुष के शरीर में नाडी भली प्रकार से(समरस, समदोष) चलती रहे, उस को वैद्यजन स्वस्थ समझते हैं; परन्तु जिस के शरीर में नाडी विषम(कठोर) रूप से चल रही हो, उस के ये लक्षण देखकर वैद्य समझ लेते हैं कि निकट भविष्य में ही इस को कोई प्रबल रोग होने वाला है ॥५॥
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नारी चलै उतावली, नख सिख लागै भाहि । 
सुन्दर पटकै पीव सिर, दुःख सुनावै काहि ॥६॥ 
(यहाँ भी 'नारी' शब्द श्लिष्टार्थक है - )
१.श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - किसी किसी घर में ऐसी कुलक्षणा नारी आ जाती हैं जो घर में कार्य करते समय इतनी तीव्रता से इधर उधर चलती है मानो उस का समस्त शरीर(नख से शिखा तक) अग्नि से जल रहा हो । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं -उसे देख कर उसके घर वाले विवश होकर भूमि पर अपने पैर पटक कर ही रह जाते हैं कि अपनी यह हार्दिक वेदना किसे सुनावें ! ॥
२. श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जिस रोगी के शरीर में वायु आदि दोषों से कुपित नाडी इतनी तीव्रता से ऊपर नीचे होती है कि कोई न कोई कठिन रोग उसके शरीर में हो जाता है । उस रोग की तीक्ष्ण वेदना से व्याकुल रोगी पुरुष अपने पैर पटकता हुआ यही सोचता रह जाता है कि अब यह असह्य कष्ट किसे सुनाऊँ ॥६॥
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नारी घर बैठी रहै, पर घर करै न गौंन । 
सुन्दर पावै पीव सुख, दोष लगावै कौंन ॥७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - सुलक्षणा नारी दिन रात अपने घर के कार्यों में लगी रहती है । वह कभी दूसरों के घर में व्यर्थ नहीं जाती । उस सुलक्षणा नारी के इस चरित्र से उस के घर वाले भी प्रसन्न रहते हैं; क्योंकि इस से उन को भी सुख मिलता है कि उस पर लाञ्छन लगाने के लिये कोई अवसर ही नहीं मिलता ॥७॥
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नारी प्यारी पीव कौं, सुन्दर आठौं याम । 
जब नारी असकी परै, तब खरचै बहु दाम ॥८॥
महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधारण समय में तो नारी या नाडी सभी को प्रिय लगती है; परन्तु जब उन पर कोई अशक्य(असाध्य सङ्कट या रोग) आ जाता है तब उस के स्वामी को उस(सङ्कट या रोग) के निवारण के लिये बहुत धन खर्चना पड़ता है ॥८॥
(क्रमशः) 

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