रविवार, 2 नवंबर 2025

*किशनगढ पधारना*

*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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*किशनगढ पधारना*  
आचार्य निर्भयराम जी महाराज रामत करते हुये वि. सं. १८४७ में किशनगढ पधारे थे । किशनगढ नरेश प्रतापसिंह जी को सूचना मिली कि नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयराम जी महाराज पधारे हैं । तब राजा ने आचार्य निर्भयराम जी का जैसे अपने पूर्वज राजा नारायणा दादूधाम के आचार्यों का स्वागत सत्कार करते आये थे, वैसे ही बाजे गाजे से राजकीय साधनों से स्वागत सत्कार किया 
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जब तक आचार्य निर्भयराम जी किशनगढ में विराजे तब तक राजा ने आचार्य के उपदेश मृत का पान किया । निर्भयराम जी महाराज परम विरक्त और उच्चकोटि के संत थे, उनके सत्संग का राजा पर अच्छा प्रभाव पडा । जब आचार्य निर्भयराम जी किशनगढ से विचरने का विचार करने लगे तब राजा प्रतापसिंह ने आचार्य जी को भूमि का एक पट्टा भेंट करना चाहा किन्तु आचार्य निर्भयरामजी तो विरक्त थे । उन्होंने स्वीकार नहीं किया । 
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परन्तु राजा ने संकल्प कर लिया था । इससे राजा प्रतापसिंह ने निर्भयरामजी महाराज के शिष्य बिहारीदासजी के नाम ११२ बीघा भूमि का पट्टा करके बिहारीदासजी को भेंट कर दिया । इस पट्टे में रबी की फसल की भूमि १२ बीघा और खरीफ की फसल की १०० बीघा भूमि लिखी है । यह पट्टा किशनगढ नरेश प्रतापसिंह जी की आज्ञा से दादूपंथी साधु बिहारीदासजी को वि. सं. १८४७, माघ वदि ११ को दिया गया था ।
(क्रमशः)

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