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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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आचार्य निर्भयराम जी महाराज ने वि. सं. १८४९ के नारायणा दादूधाम के मेले में अपने गुरुवर आचार्य चैनराम जी महाराज की छत्री का मेला किया और पूजा बांटी । हो सकता है आपके गुरु चैनराम जी भी परम विरक्त थे । धन संग्रह नहीं छोडे गये होंगे । आप भी परम विरक्त होने कारण इतने समय तक पूजा नहीं बांट सके होंगे । फिर कहीं इसी निमित से राजा महाराजाओं से धनराशि आई होगी, तब बांटी गई होगी । बाकी पूजा बांटने में उस समय समाज में तो ऐसी कोई भी बात नहीं थी जिससे इतने दिन पूजा बांटना रुका रहे ।
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आचार्य निर्भयराम जी ने ही वि. सं. १८५० में दादू द्वारे के बाहर बहुत विस्तृत पशुशाला तथा अतिथियों के ठहरने के लिये मकान बनवाये थे । पश्चात् डोबला के केशवदासजी के यहां चातुर्मास किया । चातुर्मास में वाणी प्रवचन, संतों के साधन - भजन आदि कार्य सुचारु रुप से होते रहे ।
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आस पास की धार्मिक जनता ने सत्संग व सेवा में अच्छा भाग लिया । चातुर्मास के पश्चात् भक्तों के आग्रह से लोक कल्याणार्थ आचार्य निर्भयराम जी महाराज ने मालवा प्रान्त की रामत की । आप भ्रमण करते हुये इन्दौर पहुँचे तब इन्दौर के होल्कर नरेश ने आप का बहुत सम्मान किया । दादूवाणी के प्रवचन सुनने से तथा आचार्य निर्भयराम जी के दर्शन सत्संग से तत्कालीन इन्दौर नरेश को अति आनन्द का लाभ हुआ ।
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आचार्य निर्भयराम जी इन्दौर नरेश के यहां से विचरने का विचार करने लगे तब राजा ने भेंट आदि के द्वारा आचार्य निर्भयरामजी महाराज का अच्छा सन्मान किया और वहां से चलते समय इन्दौर नरेश ने लिखवाकर आचार्य निर्भयराम जी के पास भेजा और कहलाया इसको साथ रखें । यह इन्दौर राज्य में आपके भ्रमण में कोई बाधा नहीं होने देगा ।
(क्रमशः)

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