शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

दूरदर्शन व दूसरा शरीर धारण

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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८ आचार्य निर्भयरामजी
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रणजीतसिंह भी नारायणा दादूधाम की उक्त घटना को जानते थे और वर्तमान आचार्य निर्भयराम जी कीर्ति भी रणजीतसिंह जानते थे । निर्भयरामजी महाराज ने जोधसिंह को पुन: राज्य प्राप्ति का साधन - “हरि, गुरु, संतों की सेवा करो ।” यही बताया है । और जोधसिंह ने अपने स्थान में - हरि, गुरु, भक्त, संतों की सेवा करना भी आरंभ कर दिया था । 
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उक्त सब बातों का विचार करके रणजीतसिंह जोधसिंह के पास आया और जोधसिंह को हरि भक्ति में अनुरक्त और संत सेवा में लगा देखकर अति प्रसन्न हुआ और उसका राज्य लौटा दिया । इससे जोधसिंह का निर्भयराम के वचनों पर और भी अधिक दॄढ विश्‍वास हो गया था । 
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उसने निर्भयरामजी महाराज को अपने गुरु मानकर पर्वत के पास नदी के तट पर संतों के लिये निवास स्थान बनाया और उसमें संतों की सेवा करते हुये हरि भजन करने लगा ।(गुरु पद्धति से) 
इस जोध की कथा संबन्धी एक कवित्त देखिये - 
चातुरमास सु पारिये बाग सु ह्वै परसाद जु पांति तियारा । 
आप कह्यो हम जीमत नांहिन दोय घ़डी गये जीमन धारा ॥
सेवक संत कियो हठ बूझत, जोध प्रजुद्ध जमाति जु भारा ।  
मंगल ब्यौर मंगाय लियो उत कोस दशोतर बैठ निहारा । ४९ । प्र. ३३ ।  
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उक्त कवित्त से ध्वनित होता है कि - चातुर्मास के समय आचार्य निर्भयरामजी महाराज बाग में विराजे थे, उस समय जिस सेवक की रसोई थी उसने आकर प्रार्थना की - महाराज ! प्रसाद तैयार है, पंक्ति की भी तैयारी हो गई है, पधारिये । आचार्य निर्भयराम जी महाराज ने कहा - अभी हम नहीं जीमेंगे, थोडे ठहरो । फिर दो घ़डी व्यतीत होने पर महाराज ने कहा - अब जीमेंगे, पंक्ति की तैयारी करो । फिर पंक्ति लग गई । 
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जीमने के पश्‍चात् सेवकों तथा संतों ने कहा - भगवन् ! आज आपने भोजन करने में इतनी देर क्यों की थी ? महाराज ने कहा - कोई ऐसा ही प्रसंग आ गया था इससे ठहरना पडा । संतों ने कहा - प्रकट में तो कोई ऐसा ही प्रसंग दृष्टि में नहीं आया था फिर भी कोई प्रसंग आया हो तो कृपा करके हम लोगों को भी बतावें वह क्या प्रसंग था ? महाराज बताना नहीं चाहते थे किन्तु संतों और भक्तों ने बहुत हठ किया । 
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तब आचार्य निर्भयराम जी ने कहा - राजा जोधसिंह के संत निवास में भ्रमण करती हुई एक साधुओं की जमात आई हुई है । उस जमात के साधुओं के बीच में परस्पर झगडा हो गया था, एक दूसरे को दंडे मार रहे थे । उनके उस विग्रह को देखकर राजा जोधसिंह ने मेरा स्मरण किया कि गुरुदेव इनको शांत करो । जोधसिंह की प्रार्थना से मेरा मन उधर ही जा रहा था, फिर मैंने उनको समझा कर शांत करने की चेष्टा की तब वे भगवत् कृपा से शांत हो गये फिर भोजन करने की इच्छा हो गई । 
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निर्भयराम जी महाराज राजा जोधसिंह के उस संत आश्रम से उस समय “कोस दशोतर” अर्थात् एक सौ दस कोस दूर थे किन्तु उनको दूरदर्शन रुप सिद्धि प्राप्त थी । अत: ११० कोस दूर से ही उन्होंने अपने योग बल से सामने की घटना के समान सब देख लिया था और उनका झगडा भी मिटा दिया था । 
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फिर सेवकों ने इसका पता लगाया कि राजा जोधसिंह के संत निवास में अमुक दिन साधुओं में परस्पर झगडा हुआ था क्या ? तो ज्ञात हुआ कि हुआ था । फिर नारायणा दादूधाम के आचार्य निर्भयराम जी ने साधुओं को समझाकर उसे शांत किया था । इससे ज्ञात होता है कि निर्भयराम जी महाराज में दूरदर्शन व दूसरा शरीर धारण करके तत्काल दूर जाने की शक्ति थी । 
(क्रमशः)  

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