रविवार, 11 जनवरी 2026

रामदासजी के चातुर्मास ~

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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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रामदासजी के चातुर्मास ~  
वि. सं. १९१५ में रामदासजी नटाटा ने आचार्य उदयरामजी महाराज का शिष्य संत मंडल के सहित चातुर्मास मनाया । शिष्य संत मंडल के सहित आचार्यजी नियत समय पर पधारे । रामदासजी ने मर्यादा पूर्वक आचार्यजी की अगवानी की और बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये ले जाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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चातुर्मास का कार्यक्रम आरंभ हो गया । कथा के समय कथा, भोजन के समय भोजन, आरती, नामध्वनि आदि सब कार्य नियत समय पर होते थे । एकादशी आदि पुण्य तिथियों को जागरण आदि सब यथावत होते थे । स्थानधारी संत तथा भक्त जन भी रसोइयां लेकर आते रहते थे । 
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यह चातुर्मास अच्छा हुआ । चातुर्मास समाप्ति के समय रामदासजी ने मर्यादानुसार आचार्यजी को भेंट और शिष्य संत मंडल को वस्त्रादि देकर तथा भंडारी आदि कर्मचारियों का यथोचित सत्कार के किया था ।
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शेखावटी की रामत ~ 
वि. सं. १९१६ में शेखावटी के सेठों के आग्रह से चिडावा, रामगढ आदि शहरों में रामत करने पधारे । चिडावा पहुँचे तब चिडावा के भक्तों ने अति श्रद्धा भाव से बाजे गाजे के साथ संकीर्तन करते हुये आचार्यजी की अगवानी की और संकीर्तन करते हुये नगर के मध्य से लाकर नियत स्थान पर ठहराया । 
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संत सेवा का अच्छी प्रकार प्रबन्ध कर दिया । सत्संग होने लगा । दादूवाणी के गंभीर प्रवचन भक्त लोग बडी श्रद्धा से सुनने लगे । रसोइयां भी अति प्रेम से देने लगे । सेठ लोग आचार्यजी को शिष्य मंडल के सहित भोजन कराने मर्यादापूर्वक अपने घरों पर ले जाते थे । 
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मर्यादापूर्वक पहले आज्ञा की भेंट फिर भोजन करने के पश्‍चात् आचार्यजी को मर्यादानुसार भेंट देकर तथा संतों का यथोचित सत्कार करके मर्यादा से स्थान पर पहुंचाते थे । उक्त प्रकार चिडावा के भक्तों ने सत्संग तथा संत- सेवा दोनों ही कार्य अति श्रद्धा भक्ति से किये थे । जब आचार्यजी चिडावा से जाने लगे तब सस्नेह मर्यादा पूर्वक भेंटादि कर विदा किया था ।
(क्रमशः)  

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