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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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यूथ-क्रम ~
सबसे आगे एक डंका नगाडा अश्व पर रखा गया । उसके पीछे चौपदार जी शोभा यात्रा की सूचना देने का काम करने वाले थे । उनके पीछे जंदूरों के ऊंट, उनके पीछे नौबतों के ऊंट, उनके पीछे तासा आदि बाजे । उनके पीछे ‘दादूराम’ की ध्वनि करने वाला साधु मंडल, उनके पीछे शस्त्र कला में निपुण खंडेत ।
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उनके पीछे गायक संतों का मंडल, उनके पीछे सजा हुआ हाथी । उसके पीछे महन्तों की सवारियां । उनके पीछे साधु मंडल चल रहा था । उन साधुओं की पंक्ति हंस पंक्ति के समान सर्वथा श्वेत भास रही थी । उनके शिरों पर श्वेत शिरपेच, गलों में श्वेत कु़डते, कटि में श्वेत कटि वस्त्र, हाथी में सुमिरनी और शेल, पैरों में अधिक के जूते और कुछ के खडाऊ थी । कंधों में तलवारें लटक रही थीं ।
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उक्त प्रकार यह विशाल यूथ पंक्तिबद्ध होकर अपने प्रिय आचार्य जी की अगवानी करने जा रहा था । शनै: शनै: जहां आचार्यजी थे, वहां उक्त संत मंडल जा पहुँचा । मर्यादा सहित महन्तों ने सत्यराम बोलकर भेंटें चढाकर दंडवतें की । आचार्यजी ने उनकी मर्यादा के अनुसार उन सब का सत्कार किया । सर्व साधारण साधु संतों ने दूर से ही सत्यराम बोलकर दंडवतें की ।
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फिर आचार्यजी को हाथी पर विराजमान कराके पूर्व क्रम के अनुसार शोभा यात्रा को नगर के मुख्य बाजार से नगर की जनता को आचार्य जी के दर्शन कराते हुये चले । साथ में खंडेत अपनी शस्त्र कला दिखाते हुये चल रहे थे । गायक संतों केप द गाते चले जा रहे थे । शेष संत मंडल दादूराम मंत्र की ध्वनि करता हुआ शनै: शनै: आचार्य जी के पीछे चल रहा था ।
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स्थान २ पर दादूदयालु महाराज की जय बोली जा रही थी । भक्त लोग बीच बीच में आचार्य जी पर पुष्प वर्षा कर रहे थे । श्रद्धा पूर्वक भेंट चढा रहे थे । उन भक्तों को साथ की साथ आचार्य जी के कर्मचारी प्रसाद देते जा रहे थे । आगे चलने वाले चौपदार जनता को शोभा यात्रा की सूचना देते जा रहे थे । जंबूरों की तुमुल ध्वनि होती जा रही थी ।
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उक्त प्रकार यह आचार्य जी की शोभा यात्रा नगर के नागरिकों के नागरिकों के आनन्द को बढाती हुई आगे बढ रही थी । नगर के ठाकुर ने आचार्य जी के आगे आकर अभिवादन किया और भेंटें चढाई । कर्मचारियों ने उनको प्रसाद दिया ।
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आचार्यजी हाथी पर विराजे हुये सबका अभिवादन स्वीकार करते हुये सब को अभय मुद्रा से आशीर्वाद देते जा रहे थे । उक्त समय जमात में जो संत रह गये थे वे भी जैसे विशाल समुद्र में चारों ओर से आकर नदियां मिलती हैं, वैसे मिलने लगे । इस समय सब संतों के और सेवकों के मन हर्ष से फूल रहे थे ।
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बारंबार दादूजी की और आचार्यजी की जय बोली जा रही थी । शनै: शनै: जमात से चलती हुई यह शोभा यात्रा आचार्यजी को ठहरने के लियेजो स्थान नियत किया हुआ था उस स्थान पर पहुँच गई और मर्यादा पूर्वक आचार्य जी को वहां ठहराया गया । प्रसाद बांटकर शोभा यात्रा समाप्त की ।
(क्रमशः)

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