रविवार, 18 जनवरी 2026

*(२)नरेन्द्रादि भक्तों का शिवरात्रि व्रत*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप ।*
*मोह्या कनक अरु कामिनी,*
*नाना विधि के रूप ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)नरेन्द्रादि भक्तों का शिवरात्रि व्रत*
आज सोमवार है, २१ फरवरी १८८७ । नरेन्द्र और राखाल आदि ने आज शिवरात्रि का उपवास किया है । आज से दो दिन बाद श्रीरामकृष्ण की जन्मतिथि-पूजा होगी । नरेन्द्र और राखाल आदि भक्तों में इस समय तीव्र वैराग्य है । एक दिन राखाल के पिता राखाल को घर ले जाने के लिए आये थे ।
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राखाल ने कहा, "आप लोग कष्ट करके क्यों आते हैं ? मैं यहाँ बहुत अच्छी तरह हूँ । अब आशीर्वाद दीजिये कि आप लोग मुझे भूल जायँ और मैं भी आप लोगों को भूल जाऊँ ।" इस समय सब लोगों में तीव्र वैराग्य है । सारा समय साधन भजन में ही जाता है । सब का एक ही उद्देश्य है कि किस तरह ईश्वर के दर्शन हों ।
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नरेन्द्र आदि भक्तगण कभी जप और ध्यान करते हैं, कभी शास्त्रपाठ । नरेन्द्र कहते हैं "गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिस निष्काम कर्म का उल्लेख किया है, वह पूजा, जप, ध्यान - यही सब है, सांसारिक कर्म नहीं ।"
आज सबेरे नरेन्द्र कलकत्ता गये हुए हैं । घर के मुकदमे की पैरवी करनी पड़ती है । अदालत में गवाह पेश करने पड़ते हैं ।
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मास्टर सबेरे नौ बजे के लगभग मठ में आये । कमरे में प्रवेश करने पर उन्हें देखकर श्रीयुत तारक मारे आनन्द के शिव के सम्बन्ध में रचित एक गाना गाने लगे - "ता थैया ता थैया नाचे भोला ।"
उनके साथ राखाल भी गाने लगे और गाते हुए दोनों नाचने लगे ।
यह गाना नरेन्द्र को लिखे अभी कुछ ही समय हुआ है ।
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मठ के सब भाइयों ने व्रत किया है । कमरे में इस समय नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, शरद, शशी, काली, बाबूराम, तारक, हरीश, सींती के गोपाल, सारदा और मास्टर हैं । योगीन और लाटू वृन्दावन में हैं । उन लोगों ने अभी मठ नहीं देखा ।
आगामी शनिवार को शरद, काली, निरंजन और सारदा पुरी जानेवाले हैं - श्रीजगन्नाथजी के दर्शन करने के लिए ।
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श्रीयुत शशी दिनरात श्रीरामकृष्ण की सेवा में रहते हैं ।
पूजा हो गयी । शरद तानपूरा लेकर गा रहे हैं - "शंकर शिव बम् बम् भोला, कैलासपति महाराज राज ।"
नरेन्द्र कलकत्ते से अभी ही लौटे हैं । अभी उन्होंने स्नान भी नहीं किया । काली नरेन्द्र से मुकदमे की बातें पूछने लगे ।
नरेन्द्र - (विरक्तिपूर्वक) - इन सब बातों से तुम्हें क्या काम ?
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नरेन्द्र मास्टर आदि से बातें कर रहे हैं । नरेन्द्र कह रहे हैं - "कामिनी और कांचन का त्याग जब तक न होगा, तब तक कुछ न होगा । कामिनी नरकस्य द्वारम् । जितने आदमी हैं, सब स्त्रियों के वश में हैं । शिव और कृष्ण की बात और है । शक्ति को शिव ने दासी बनाकर रखा था । श्रीकृष्ण ने संसार-धर्म का पालन तो किया था, परन्तु वे कैसे निर्लिप्त थे ! उन्होंने वृन्दावन कैसे एकदम छोड़ दिया !"
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राखाल - और द्वारका का भी उन्होंने कैसा त्याग किया !
गंगा-स्नान करके नरेन्द्र मठ लौटे । हाथ में भीगी धोती है और अँगौछा । सारदा ने आकर नरेन्द्र को साष्टांग प्रणाम किया । उन्होंने भी शिवरात्रि के उपलक्ष्य में उपवास किया है । अब वे गंगा-स्नान के लिए जानेवाले हैं । नरेन्द्र ने पूजा-घर में जाकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया और फिर आसन लगाकर कुछ समय तक ध्यान करते रहे ।
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भवनाथ की बातें हो रही हैं । भवनाथ ने विवाह किया है । इसलिए उन्हें नौकरी करनी पड़ती है ।
नरेन्द्र कह रहे हैं, 'वे तो सब संसारी कीट हैं ।'
दिन ढलने लगा । शिवरात्रि की पूजा के लिए व्यवस्था हो रही है । बेल की लकड़ी और बिल्वदल इकट्ठे किये गये । पूजा के बाद होम होगा ।
(क्रमशः)

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