रविवार, 11 जनवरी 2026

क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*प्रेम भक्ति दिन दिन बधै, सोई ज्ञान विचार ।*
*दादू आतम शोध कर, मथ कर काढ़या सार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"... ज्ञानयोग अवश्य ही अति श्रेष्ठ मार्ग है । उच्च तत्त्वज्ञान इसका प्राण है, और आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रत्येक मनुष्य यह सोचता है कि वह ज्ञानयोग के आदर्शानुसार चलने में समर्थ है । परन्तु वास्तव में ज्ञानयोग-साधना बड़ी कठिन है । ज्ञानयोग के पथ पर चलने में हमारे गड्ढे में गिर जाने की बड़ी आशंका रहती है ।
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कहा जा सकता है कि इस संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं । एक तो आसुरी प्रकृतिवाले जिनकी दृष्टि में अपने शरीर का पालन-पोषण ही सर्वस्व है और दूसरे दैवी प्रकृतिवाले, जिनकी यह धारणा रहती है कि शरीर किसी एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए केवल एक साधन तथा आत्मोन्नति के लिए एक यन्त्रविशेष है ।
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शैतान भी अपनी कार्यसिद्धि के लिए झट से शास्त्रों को उद्धृत कर देता है, और इस प्रकार प्रतीत होता है कि बुरे मनुष्य के कृत्यों के लिए भी शास्त्र उसी प्रकार साक्षी है जैसे कि एक सत्पुरुष के शुभ कार्य के लिए । ज्ञानयोग में यही एक बड़े डर की बात है । परन्तु भक्तियोग स्वाभाविक तथा मधुर है । भक्त उतनी ऊँची उड़ान नहीं उड़ता जितनी कि एक ज्ञानयोगी, और इसीलिए उसके उतने बड़े खड्डों में गिरने की आशंका भी नहीं रहती ।..." 
 -'भक्तियोग' से उद्धृत
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क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं ? स्वामीजी का विश्वास
भारत के महापुरुषों(The Sages of India) के सम्बन्ध में स्वामीजी ने जो भाषण दिया था, उसमें अवतार-पुरुषों की अनेक बातें कही हैं । श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, बुद्धदेव, रामानुज, शंकराचार्य, चैतन्यदेव आदि सभी की बातें कही । भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन का उद्धरण देकर समझाने लगे, 'जब धर्म की ग्लानि होकर अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तो साधुओं के परित्राण के लिए, पापाचार को विनष्ट करने के लिए मैं युग युग में अवतीर्ण होता हूँ ।'
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उन्होंने फिर कहा, 'गीता में श्रीकृष्ण ने धर्मसमन्वय किया है', -
"... हम गीता में भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के विरोध के कोलाहल की दूर से आती हुई आवाज सुन पाते हैं, और देखते हैं कि समन्वय के वे अद्भुत प्रचारक भगवान श्रीकृष्ण बीच में पड़कर विरोध को हटा रहे हैं ।....” 
 -'भारतीय व्याख्यान' से उद्‌धृत
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"श्रीकृष्ण ने फिर कहा है, - स्त्री, वैश्य, शूद्र सभी परम गति को प्राप्त करेंगे, ब्राह्मण क्षत्रियों की तो बात ही क्या है !
"बुद्धदेव दरिद्र के देव हैं । सर्वभूतस्थमात्मानम् - भगवान सर्वभूतों में हैं - यह उन्होंने प्रत्यक्ष दिखा दिया ।
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बुद्धदेव के शिष्यगण आत्मा, जीवात्मा आदि नहीं मानते हैं - इसीलिए शंकराचार्य ने फिर से वैदिक धर्म का उपदेश दिया । वे वेदान्त का अद्वैत मत, रामानुज का विशिष्टाद्वैत मत समझाने लगे । उसके बाद चैतन्यदेव प्रेमभक्ति सिखाने के लिए अवतीर्ण हुए । शंकर और रामानुज ने जाति का विचार किया था, परन्तु चैतन्यदेव ने ऐसा न किया । चैतन्यदेव ने कहा, 'भक्त की फिर जाति क्या ?' "
(क्रमशः)

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