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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*४. गुरु-शिष्य निगुर्ण का अंग ~९/१३*
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*बैयर सौं बैयर मिल्यों, कहो पूत क्यों होय ।*
*त्यों रज्जब सद्गुरु बिना, सब खोजों२ की जोय१ ॥९॥*
कहो ? नारी१ से नारी मिले तब पुत्र कैसे होगा ? वैसे ही सद्गुरु के बिना सभी शिष्य नपुँसकों२ की नारियों के समान है । जैसे नपुँसक की नारी से संतान नहीं होती वैसे ही सद्गुरु बिना शिष्यों को ज्ञान नहीं होता ।
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*अजा१ कंठ कुच पय२ नहीं, क्या पीवे दुहि ग्वाल ।*
*त्यों रज्जब शिष सूम गति, गुरु भूखा बेहाल ॥१०॥*
बकरी१ के गले के स्तनों में दूध२ नहीं होता, वे तो देखने मात्र के ही होते हैं । उनको ग्वाला दुह करके पीना चाहै तो क्या पीयेगा ? वैसे ही यदि शिष्य सूम मिल जाय और गुरु आशा द्वारा भूखा मिल जाय तो उक्त अजागलस्तन और ग्वाला की-सी ही दुखद गति उनकी होगी ।
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*घर घर दीक्षा देहिं गुरु, शिष्य न सुलझे कोय ।*
*जन रज्जब सब लालची, ताथैं भला न होय ॥११॥*
स्वार्थी गुरु घर घर पर जाकर दीक्षा देते हैं किन्तु उनके उपदेश से कोई भी शिष्य अज्ञान बन्धन से नहीं निकलता, कारण - गुरु और शिष्य दोनों ही सांसारिक विषयों के लोभी हैं, इसलिये दोनों का ही मुक्ति रूप भला नहीं होता ।
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*शिष सारे गुरु को गिलैं, गुरु सेवक सब खाय ।*
*रज्जब दोनों यूँ मिले, हरि में कौन समाय ॥१२॥*
शिष्य तो सभी गुरु के धनादि को खाना चाहता हैं और गुरु सभी सेवकों का खाना चाहता है इस प्रकार दोनों ही सांसारिक आशाओं से घिरे हुये है तब दोनों में से हरि में कौन समायेगा ? अर्थात दोनों ही मुक्त न हो सकेंगे ।
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*कुल चेले चीणा भये, गुरु को यह गम१ नाँहिं ।*
*रज्जब पैठा प्रीति कर, बूडि मुवा यूँ माँहिं ॥१३॥*
चीणा नामक अनाज चपटा और चिकना होता है, उसकी राशि पर कोई कूद पड़े तो उसमें डूब जाता है । वैसे ही शिष्य तो सब चीणा के समान हैं, किन्तु गुरु को यह ज्ञान१ नहीं कि यह मुझे ही दबा लेंगे, वह तो प्रेम से उनमें प्रवेश करता है परन्तु अन्त में उनके जाल से उन्हीं में समाप्त हो जाता है अर्थात गुरु का सर्वस्व वे ही खा जाते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “४. गुरु-शिष्य निर्गुण का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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