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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग ५/८*
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जन सुन्दर सतसंग मैं, नीचहु होत उतंग ।
परै क्षुद्र जल गंग मैं, उहै होत पुनि गंग ॥५॥
जैसे किसी क्षुद्र नाले का जल गङ्गा में गिरते ही 'गङ्गाजल' कहलाने लगता है, तब उसे अपवित्र नाले का जल' कहने वाला कोई नहीं रह जाता । इसी प्रकार, सत्सङ्ग के प्रभाव से क्षुद्र वस्तु भी 'उत्तम'(सर्वोच्च या सर्वश्रेष्ठ) कही जाने लगती है ॥५॥
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सुन्दर या सतसंग मैं, शब्दन कौ औगाह ।
गोष्टि ज्ञान सदा चलै, जैसें नदी प्रवाह ॥६॥
महाराज कहते हैं - इस साधुओं की सङ्गति में निरन्तर प्रभुभक्तिमय शब्दों का अवगाहन(श्रवण एवं मनन) होता रहता है । इस सत्सङ्ग में आध्यात्मिक ज्ञानमय संवाद, नदीप्रवाह के समान, सतत प्रवाहित होता रहता है ॥६॥
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सुन्दर जौ हरि मिलन की, तौ करिये सतसंग ।
बिना परिश्रम पाइये, अविगति देव अभंग ॥७॥
श्रीसुन्दरदासजी जिज्ञासु को समझाते हैं कि यदि तुम्हें प्रभुमिलन की उत्कण्ठा है तो तुम सब कुछ साधन छोड़कर केवल सत्सङ्ग का सहारा पकड़ लो । इस से तुम्हें अनायास(किसी विशेष परिश्रम के बिना) ही उस निरञ्जन निराकार प्रभु के साक्षात्कार का सरल मार्ग मिल जायगा ॥७॥
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जो आवै सतसंग मैं, ताकौ कारय होइ ।
सुन्दर सहजै भ्रम मिटै, संसय रहै न कोइ ॥८॥
जो निरन्तर सत्सङ्ग करेगा उसे भक्ति साधना में सफलता मिलेगी ही(उस का कार्य सिद्ध होगा ही) । इस सत्सङ्ग का उस को सबसे उत्तम लाभ यह मिलेगा कि उस का सांसारिक द्वैत भ्रम तथा उस अनिवर्चनीय शक्ति का सत्ताविषयक भ्रम स्वतः ही सर्वथा नष्ट हो जायगा ॥८॥
(क्रमशः)

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