सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

*१९. साधु कौ अंग २१/२४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. साधु कौ अंग २१/२४*
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जन सुन्दर सतसंग तें, पावै दुर्लभ योग । 
आतम परमातम मिले, दूरि होंहि सब रोग ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह साधक ऐसा सत्सङ्ग कर दुर्लभ योगविद्या में पारङ्गत हो सकता है । इस विद्या से उपलब्ध राजयोग के सहारे आत्मा का परमात्मा से ऐक्य स्थापित कर सकता है तथा अपनी सभी शारीरिक व्याधियाँ नष्ट कर शरीर से भी नीरोग हो सकता है ॥२१॥
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जन सुन्दर सतसंग तें, उपजै अद्वय ज्ञान । 
मुक्ति होय संसय मिटै, पावै पद निर्बान ॥२२॥
इस सत्सङ्ग के प्रभाव से जब साधक को अद्वैत ज्ञान हो जाता है, उस को एक साथ तीन लाभ होते हैं - १. वह भवप्रपञ्च से मुक्त हो जाता है, २. उस का द्वैतविषयक भ्रम मिट जाता है, तथा ३. उस को निर्वाण प्राप्त हो जाता है ॥२२॥
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सुन्दर सब कछु मिलत है, समये समये आइ । 
दुर्लभ या संसार मैं, संत समागम थाइ ॥२३॥
सन्त का समागम दुर्लभ : इस सत्सङ्गी साधक के सभी सत्सकङ्कल्प क्रमशः शनैः शनैः पूर्ण होते चलते हैं; परन्तु सचाई यह है कि ऐसे साधक को सच्चा सन्त मिलना ही आज दुर्लभ है ! ॥२३॥
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मात पिता सबही मिलैं, भइया बंधु प्रसंग । 
सुन्दर सुत दारा मिलैं, दुर्लभ है सतसंग ॥२४॥
इस संसार में सब कुछ सुगमता से मिल सकता है - माता पिता भी, भाई एवं बन्धु बान्धव भी, पुत्र या पत्नी भी । परन्तु साधुजनों की सङ्गति पूर्व जन्म के किसी विशाल पुण्य के प्रताप से कोई सौभाग्यशाली साधक ही पा सकता है ॥२४॥
(क्रमशः) 

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