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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२०. विपर्यय कौ अंग ३३/३६
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पहराइत घर कौं मुसै, साह न जांनै कोई ।
चोर आइ रक्षा करै, सुन्दर तब सुख होइ ॥३३॥
ज्ञानी पुरुष की ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ काया के नौ(९) द्वारों पर पहरेदार(रक्षक) बैठी हुई अपने रक्षा कर्म से विमुख होकर विषयभोगों के प्रति लोलुपता उत्पन्न कर मन आदि अन्तःकरण रूप घर को इतने दीर्घ काल से नष्ट कर रही थी । इस का काया के स्वामी(जीव) को ज्ञान भी नहीं था । तब प्रसिद्ध चौर(भगवान्) ने उस अपने भक्त पर दया कर, उन कृतघ्न पहरेदारों को निगृहीत कर अन्तःकरण रूप घर की रक्षा की तथा उस के मन को भगवान् की ओर अभिमुख कर दिया । तब वह त्रिविध सांसारिक दुःखों से मुक्त होकर ब्रह्मानन्द का अनुभव करने लगा ॥३३॥ (द्र० - सवैया: २२/छ० सं० २४) ॥
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कोतवाल कौं पकरि कै, काठौ राख्यौ जूरि ।
राजा भाग्यौ गांव तजि, सुन्दर सुख भरपूरि ॥३४॥
इतना ही नहीं, उन भगवान् ने अज्ञानकाल में चञ्चल मन रूप कोतवाल(रक्षक) को निगृहीत कर उसके सङ्कल्प-विकल्प आदि की ओर गमन को दृढता से रोक दिया(काठो राख्यौ जूरि) । ऐसी स्थिति में राजा(रजोगुण) ने भी उस गाँव(अन्तःकरण) को छोड़ना ही उचित समझा; क्योंकि अब तक कोतवाल के बल पर ही राजा राज्य करता था । अतः बल के नष्ट होने पर राजा भी राज्य छोड़ कर भाग गया । अर्थात् चित्तवृत्ति के निरोध से, सद्गुण की वृद्धि होने पर, साधक को शान्ति मिली ॥३४॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० २४) ॥
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नाइक लाद्यौ उलटि करि, बैल बिचारै आइ ।
गौंन भरी लै बस्तु मैं, सुन्दर हरिपुर जाइ ॥३५॥
बलवान् एवं अहङ्कारी इस जीव ने, अन्त में निष्काम वृत्ति धारण कर, अपना समस्त कर्मभार अपने स्वामी(नायक = ब्रह्म) पर ही लाद दिया(उसको सौंप दिया) । अर्थात् अपने सभी गौण(तीनों गुणों से उत्पन्न) कर्म ब्रह्म को अर्पण कर दिये१ । इसके फलस्वरूप यह साधक ब्रह्मलोक(समाधि की तुरीयावस्था) में पहुंचकर आनन्दानुभव करने लगा ॥३५॥
{द्र० – सवैया : २२/छ० २२)
(१ श्रीमद्भगवदगीता – ५/१०)
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संग त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥}
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सुन्दर राजा बिपति सौं, घर घर मांगै भीख ।
पाय पयादौ उठि चलै, घोरा भरै न बीख ॥३६॥
राजा = रजोगुणयुक्त जीव या मन विविधतृष्णारूप विपत्तियों में लिप्त होने से उन की पूर्ति के लिये घर घर जाकर अनेक शुभाशुभ कर्म करता हुआ भिक्षा माँगता फिरता है । जब उस का घोड़ा(शरीर) थक जाता है तो वह पैदल ही घोड़े के साथ धीरे धीरे चलता(सङ्कल्प करता) हुआ अपने सङ्कल्पों को पूर्ण करने का प्रयास करता है तो भी उसे कोई भी भिक्षा नहीं देता(उसके सङ्कल्प पूर्ण नहीं करता) ॥३६॥ (द्र० - सवैया : २२/छ० सं० २५) ॥
(क्रमशः)

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