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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१९. अथ साधु कौ अंग १/४*
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संत समागम कीजिये, तजिये और उपाइ ।
सुन्दर बहुते उद्धरे, सत संगति मैं आइ ॥१॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - साधक को सद्गुणों की प्राप्ति के लिये अन्य सभी उपायों का त्याग कर केवल सत्सङ्ग का आश्रय लेना चाहिये; क्योंकि इस अनुपम सत्सङ्गति साधन द्वारा ही अनेक साधक दुस्तर भवसागर को पार कर सके हैं ॥१॥
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सुन्दर या सतसंग मैं, भेदाभेद न कोइ ।
जोई बैठै नाव मैं, सो पारंगत होइ ॥२॥
इस सत्सङ्ग का आश्रय लेने पर कोई भेद या अभेद, जाति, वर्ण, कुल, आश्रम, आयु, धन आदि की हीनता या उत्तमता नहीं देखी जाती । जैसे नौका की यात्रा में उक्त हीनता या उत्तमता का कोई महत्त्व नहीं होता; क्योंकि उसमें जो भी बैठा वह दुर्गम नदी के पार हो गया; वैसे ही जिसने भी सत्सङ्ग किया वह एक न एक दिन भवसागर से पार हो ही गया ॥२॥
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सुन्दर जो सतसंग मैं, बैठै आइ बराक ।
सीतल और सुगंध ह्वै, चंदन की ढिग ढाक ॥३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यदि कोई मूढ जन(बराक) भी सत्सङ्गति करने लगे तो उसकी मूढता उसी प्रकार भङ्ग हो जाती है, जैसे किसी चन्दन वृक्ष के पास उत्पन्न हुए ढाक के वृक्ष में भी शीतलता एवं सुगन्ध आ जाती है ॥३॥
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सुन्दर या सतसंग की, महिमा कहिये कौंन ।
लोहा पारस कौं छुवै, कनक होत है रौंन ॥४॥
इस सत्सङ्गति की यथातथ(वास्तविक) महिमा का व्याख्यान कौन कर सकता है । लोक में हम देखते हैं - पारस का स्पर्श होते ही लोह धातु सुन्दर सवर्ण के रूप में परिवर्तित हो जाती है - यह सत्सङ्ग का ही प्रताप है ! ॥४॥
(रौंन = रमणीय)
(क्रमशः)

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