बुधवार, 22 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३३/३६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३३/३६ 
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यौं भ्रम तें बहु दिन भए, बीति गयौ चिरकाल । 
सुन्दर लह्यौ न आपुकौं, भूलि पर्यौ भ्रमजाल ॥३३॥
आत्मा को इस भ्रमात्मक स्थिति में रहते हुए बहुत दिन बीत गये । अधिक काल होने के बाद भी यह आत्मा स्वरूप ज्ञान की स्थिति में न आ सका और इस भ्रमजाल में अधिक गहरा फैलता ही चला गया ॥३३॥
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देह मांहिं ह्वै देह सौ, कियौ देह अभिमांन । 
सुन्दर भूलौ आपु कौं, बहुत भयौ अज्ञांन ॥३४॥
देह का अध्यास रखने पर देहाभिमान होना अनिवार्य हो जाता है । अतः यह आत्मा देहाभिमानी होकर, अज्ञान से आवृत होने से स्वरूप को भूल जाता है ॥३४॥
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कामी हूवौ काम रत, जती हुवौ जत साधि । 
सुन्दर या अभिमान तें, दोऊ लागी ब्याधि ॥३५॥
उस देहाभिमान के कारण, कभी यह आत्मा कामभोगों में रत रहकर कामी हो जाता है; कभी उस कामवासना को त्याग कर इन्द्रियसंयमी होकर साधना करने लगता है । इस देहाभिमान के कारण, इस के ये दोनों उपर्युक्त कर्म(भोग एवं त्याग) इस(आत्मा) के गले पड़ जाते हैं ॥३५॥
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कतहू भूलौ नीच ह्वै, कतहू ऊंची जाति । 
सुन्दर या अभिमांन करि, दोनौं ही कै राति ॥३६॥
देहभिमान से स्मृतिभ्रंश होने के कारण, कभी वह प्रमादवश स्वयं को नीच जाति का मान बैठता है; कभी उच्च जाति का; इस उभय प्रमाद का कारण एकमात्र देहाभिमान ही है जिससे उत्पन्न अज्ञान उस की स्मृति को आवृत कर बैठा है । (राति = अज्ञानन्धकार) ॥३६॥
(क्रमशः)

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