सोमवार, 13 अप्रैल 2026

रामराइ मैं तरकसबंध तेरा

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सिद्धि न माँगूं, रिद्धि न माँगूं,*
*तुम्ह ही माँगूं, गोविन्दा ॥*
*दादू तुम बिन और न माँगूं,*
*दर्शन माँगूं देहुजी ॥*
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*विनती ॥*
रामराइ मैं तरकसबंध तेरा ।
अबकी बार मया करि लीजै, मियाँ महोला मेरा ॥टेक॥
हुँ आदि कदीम तुम्हारा चाकर, तैं राख्या तहाँ रहिया ।
गिरता पड़ता साथि तुम्हारा, जहाँ तहाँ निरबहिया ॥
पाँच हाजारि को सात हजारी, हुकम तुम्हारे मांहीं ।
आसामी एक हमारी होती, सो कागलि चढ़ी क नांहीं ॥
साढ़ी तीनि कोड़ि की कहिये, अैसी सो आसामी ।
मुह आगैं मुजरा कै कारणि, ऊभी अंतरजामी ॥
रिधी न मांगूँ सिधी न मांगूँ, मुकति न मांगन आऊँ ।
एकैभाव भगति कै ताँई, तूँ कह तहाँ दगाऊँ ॥
सील सनाह षिमाँ करि खेड़ी, सुमिरण सेल सयाण ।
बषनां एक तुम्हारै आगैं, इहि विधि सौं उलिगाणा ॥९०॥
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तरकसबंध = राजा की सेना का योद्धा,सिपाही । मया = मेहरवानी, दया । प्रायः दया तथा कृपा एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं किन्तु दोनों में सूक्ष्म अंतर है । कृपा परिचित पर की जाती है । जिस पर कृपा की जाती है उसकी पात्रता का विचार किया जाता है । इसके विपरीत दया जान-अनजान सभी पर की जाने वाली भावना का नाम है । अतः इसमें पात्रापात्र, हेतु-अहेतु का प्रश्न नहीं उठता । इसीलिये परमात्मा अहैतुक दयालु कहा गया है । जिस प्रकार माँ बच्चे के गुणावगुणों पर बिना विचार किये उसका लालन-पालन करती है, वैसे ही परमात्मा जीव को मनुष्य शरीर देकर अहैतुकी कृपा करता है ।
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इसीलिये संतों ने दया को मया = माँ जैसी दया बना दिया । मियाँ महोला = एकमात्र स्वामी । कमीद = परम्परा । गिरता-पड़ता = दुःख सुख में, हमेशा । आसामी = राजा के अधीन रहने वाला जागीरदार । कागलि = कागज = बहियों में = लेखों में । साढे तीनि कोडि = साढ़े तीन कौड़ियों के बराबर का मन्सवदार, अत्यन्त तुच्छ, निम्न स्तर का आसामी । आसामी = जागीरदार = भक्त । मुजरा = नमस्कार । मुकति न = भक्तिमार्ग में “मुक्ति निरादर भगति लुभाने” मुक्ति का निरादर करके भक्ति मात्र की आकांक्षा करते हैं । दगाऊँ = चला जाऊँ । सनाह = कवच । खेड़ी = फौलाद, पक्का लोहा । सेल = भाला । चढ़ी क नांहीं = लिखी गई अथवा नहीं । उलिगाणा = निवेदन, प्रार्थना, विनती ।
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हे रामजी रूपी राजा ! मैं आपका एक छोटा सा महत्त्वहीन सिपाही हूँ । हे मेरे एकमात्र स्वामी ! अबकी मेरे ऊपर दया करके मुझे अपना लीजिये । मैं आपका प्रारम्भ का ही परम्परागत सेवक हूँ । नया-नया नहीं हूँ । परम्परागत होने से विश्वास करने लायक हूँ । आप मुझे अपनी सेना में बेहिचक भर्ती कर सकते हैं । मैं आपकी आज्ञाओं का पालनहार भी रहा हूँ । 
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आपने मुझे जहाँ रखा है, मैं वही और वैसे ही रहा हूँ । हानि-लाभ, जय-पराजय, खुशी-गम जैसी भी परिस्थितियाँ रही हैं, मैं हमेशा आपकी ही सेवा में रहा हूँ । मैं कभी भी अवसरवादी नहीं रहा । हर परिस्थिति में मैंने आपके साथ ही अपना निर्वाह कीया है । आपके हुकम = शासन में, राजत्व में कोई जागीरदार पाँच हजार तथा कोई सात हजार का मन्सवदार है । 
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मैं भी जागीरदारी के मन्सव का हकदार हूँ किन्तु आपने उस दावे को स्वीकार करके मुझे मन्सवदारी इनायत की है अथवा नहीं की है, मुझे पता नहीं है । अर्थात् मैं तो अपने आपको आपका भक्त मानता हूँ किन्तु आपने मुझे अपने भक्तों की सूची में सम्मिलित किया है अथवा नहीं किया है मुझे पता नहीं है । अन्यों की आसामीयत पाँच अथवा सात हजार की है किन्तु मेरी आसामीयत तो मात्र साढ़े तीन कौडी की है । 
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अर्थात् आपके अन्य भक्त तो बहुत ऊँचे दर्जे के हैं किन्तु उनकी तुलना में मैं बहुत ही निम्नकोटि का भक्त हूँ । हे अन्तर्यामिन् ! साढ़े तीन कौडी का आसामी मैं आपके समक्ष मुजरा = अभिवादन करने के लिये हाजिर हूँ । मैं आपसे न रिद्धि मांगता हूँ और न सिद्धि ही मांगता हूँ । और तो और मैं मुक्ति की याचना भी नहीं कर रहा हूँ । 
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मात्र एकान्तिकी = अनन्यभावयुक्त-भक्ति के लिये ही मैं आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ तथा मैं वही करने तथा वहीँ जाने को तैयार हूँ जिसकी आप आज्ञा करे । मैंने अपने आपको शील का कवच पहनाकर, क्षमा रूपी फौलादी लोहे से निर्मित सुमिरण रूपी भाले को हाथ में लेकर सुसज्जित कर रखा है । हे परमात्मन ! मैं बषनां आपके आगे उक्त प्रकार विनती करता हूँ, निवेदन करता हूँ ॥९०॥

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