सोमवार, 20 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २५/२८

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २५/२८
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विप्र ह्वै रह्यौ शूद्र सौ, भूलि गयौ ब्रह्मत्व । 
सुन्दर ईश्वर आपही, मांनि लियौ जीवत्व ॥२५॥
आत्मा के उस आचरण से ऐसा ज्ञात होता है कि मानो किसी ब्राह्मण ने अपना ब्राह्मणत्व भुला कर शूद्रत्व ग्रहण कर लिया हो । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपना ब्रह्मत्व भूल गया है । इसने भी अपना ईश्वरत्व त्याग कर जीवत्व ग्रहण कर लिया है ॥२५॥
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राजा सोयौ सेज परि, भयौ स्वप्न मंहिं रंक । 
सुन्दर भूल्यौ आप कौं, देह लगाई पंक ॥२६॥
जैसे किसी राजा को, रात्रि में शय्या पर सोते हुए, स्वप्न में अपना दरिद्र रूप दिखायी दे जाय । वैसे ही इस आत्मा ने अपने पर देह का त्रिगुणात्मक पङ्क(कीचड़) लगा लिया है ॥२६॥
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ज्यौं नर बहुत स्वरूप है, भ्रम तें कहै कुरूप । 
सुन्दर भूलौ आपुकौ, आतम तत्व अनूप ॥२७॥
जैसे किसी रूपवान् मनुष्य को अपने कुरूप होने का भ्रम हो जाय; उसी प्रकार इस अनुपम आत्मतत्त्व को भी भ्रम हो गया है ॥२७॥
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बनिया मूंधौ ह्वै रह्यौ, ढूंगै फेर्यौ हाथ । 
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, मेरै तौ नहिं माथ ॥२८॥ 
जैसे किसी ओंधे लेटे हुए बणिये ने अपने नितम्बों(चूतड़ों = ढूंगों) पर हाथ फेरा तो उसे ज्ञात हुआ कि यह तो नितम्ब हैं, मेरा शिर(माथा) नहीं है, तब उसको भ्रम हो गया कि अरे मेरा शिर नहीं है । यही दशा अब इस आत्मा की है ॥२८॥
(क्रमशः)  

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