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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १७/२०*
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*हनुमंत हाँक हनुमंत मुख, तो व१ हीज अब होय ।*
*पै रज्जब ता शब्द का, वक्ता औरै कोय ॥१७॥*
हनुमान जी के मुख से हनुमान जी का हाँक सुनते ही पुरुष हिजड़े हो जाते थे किन्तु अब हनुमान जी के बिना ही अनेक मानव वही१ आवाज दें, कोई नहीं हिजड़ा होता । वैसे ही ब्रह्मवेता के मुख से महावाक्य रूप शब्द सुनने से ब्रह्मवेता हो जाते थे, अब उसी महावाक्य को अनेक परोक्ष ज्ञानी सुनाते हैं, परन्तु कोई भी ब्रह्मवेता नहीं होता, कारण - महावाक्य का यथार्थ वक्ता तो विद्या मात्र के विद्वानों से भिन्न ब्रह्मनिष्ठ ही होता है । सिंहल द्वीप में हनुमान जी किसी नियत समय पर हाँक मारते हैं उसे सुनने वाले पुरुष हिजड़े हो जाते हैं ।
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*चंबुक चर्चा गहि गुण गाढ़, सुरति सूई रज रिधि सौं काढ़ ।*
*पारस गुरु मिलतहि गति जोय, वहि सोना वहि साधू होय ॥१८॥*
जैसे चम्बुक सूई को रज से निकालकर पकड़ लेता है । वैसे ही ज्ञान चर्चा माया रूप ऋद्धि और मायिक गुणों से वृत्ति को निकालकर दृढ़ता से पकड़ लेती है, माया में नहीं जाने देती । लोहा पारस से मिलता है और शिष्य सद्गुरु से मिलता है तब देखो, मिलते ही उनकी क्या गति होती है । जो गलियो में पड़ा काट से गल गल रहा है वही लोहा सुवर्ण बन जाता है और जो संसार के विषयों में आसक्त था वही प्राणी निरासक्त संत बन जाता है । ये उक्त संयोग से ही बनते हैं ।
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*रज्जब सद्गुरु ज्योति जिव, शब्द सही सुप्रकास ।*
*शिष सोने कर्म काट१ का, कहिं मिल होय सु नास ॥१९॥*
सद्गुरु जीवों के लिये ज्योति के समान हैं, उनके यथार्थ शब्द ही सुन्दर प्रकाश है । लोहे के खंड पारस से कहीं भी मिले उनके मैल का नाश होकर वे सुवर्ण बन जाते हैं; वैसै ही शिष्य गुरु से कहीं भी मिलें, उनके कर्मों का नाश होकर वे ब्रह्मनिष्ठ हो जाते हैं ।
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*गुरु नराधिपति शिष उमराव१, वचन बीच प्रतिहार२ सुभाव ।*
*घट३ बध४ पटा करे नर नाथ, सो निधि५ नहीं शब्द के हाथ ॥२०॥*
गुरु राजा के समान हैं, शिष्य सरदारों१ के समान हैं, वचन समाचार देनेवाले२ के समान हैं, सरदारों के लिये पट्टा करते समय कमी३ वेशी४ करनी हो, तो राजा ही कर सकता है, यह राजा के हाथ का खजाना५ समाचार देने वाले के हाथ नहीं है, वैसे ही शिष्यों की योग्यता की कम वेशी गुरु के ही हाथ है अन्य के नहीं ।
(क्रमशः)

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