बुधवार, 6 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ४१/४४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४१/४४*
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*कमान कसौटी१ विरह शर, प्राण चलावन हार ।*
*रज्जब छेदे सकल गुण, यूं अरि हूं हि सु मार ॥४१॥8
साधनजन्य कष्ट१ ही धनुष है, विरह ही बाण है, साधक प्राणी ही बाण चलाने वाला वीर है, उक्त सामग्री द्वारा ही सब गुण नष्ट किये जाते हैं, इस प्रकार ही कामादि शत्रुओं को सम्यक् रीति से मारना चाहिये ।
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*ज्यों चुंबक शिल नाल जटि, अस१ ऊभा रह जाय ।*
*त्यों रज्जब मन को विरह, जे देख्या निरताय२ ॥४२॥*
जैसे चुम्बक की शिला पर अश्व१ का पैर पड़ते ही उसके पैर की लोहे की नाल चुंबक पर भूषण में रत्न के समान जटिल हो जाती है और घोड़ा वहां ही खड़ा हो जाता है, चल नहीं सकता, वैसे ही मन को भगवद्-विरह रोक देता है, विषयों में नहीं जाने देता, जिन साधकों ने विचार२ कर के देखा है, उन्हें यह ठीक ज्ञात हुआ है ।
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*विरह केतकी पैठि कर, मन मधुकर व्है नास ।*
*रज्जब भुगते कुसुम बहु, मरे न तिन की वास ॥४३॥*
भ्रमर बहुत प्रकार के पुष्पों की वास-रस का उपभोग करता है किन्तु उसकी सुगंध से मरता नहीं और केतकी के पुष्प पर जाता है तब उसकी मस्त गंध से मस्तक फटकर मर जाता है । वैसे ही मन अन्य विषयादि से उपभोग से नहीं मरता, भगवद् -विरह व्यथा से ही मरता है ।
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*रज्जब बंशी२ विरह की, देही दरिया१ डारि ।*
*यूं अगस्त्य आरंभ बिन, मन मच्छा ले मारि ॥४४॥*
अगस्त्य के उदय होने पर वर्षाती नदी१ का पानी सुखने से मच्छी मर जाती है वा सूर्य की तीव्र किरणों के द्वारा पानी सूखने से मच्छी मर जाती है (रज्जबजी अगस्त्य शब्द का प्रयोग सूर्य के अर्थ में भी करते हैं) किन्तु अगस्त्य के जल सूखने के आरम्भ बिना भी मच्छी पकड़ने का काँटा२ नदी में डाल कर मच्छी मारी जा सकती है, वैसे ही देह रूप नदी में विरह रूपी बंशी डालकर मन-मच्छर को मारना चाहिये अर्थात विरह से मन मारा जाता है ।
(क्रमशः) 

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