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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग १३/१६
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सुन्दर ब्रह्म बिचारि है, सब साधन कौ मूल ।
याही मैं आये सकल, डाल पान फल फूल१ ॥१३॥
(१ तु० श्रीदादूवाणी : ८/७४
सब आया उस एक में, डाल पांन फल फूल ।
दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड्या मूल ॥
(निज-ब्रह्मविचार))
सूक्ष्म विचार करते करते हम को यही समझ में आया कि ब्रह्मचिन्तन ही भगवत्साक्षात्कार का एकमात्र उपाय है । अन्य छोटे बड़े उपाय तो इसी में डाल, पान, फल फूल के समान सम्पृक्त हो जायँगें ॥१३॥
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कीयौ ब्रह्म बिचार जिनि, तिनि सब साधन कीन ।
सुन्दर राजा कै रहै, प्रजा सकल आधीन ॥१४॥
बात को सरलता से ऐसे समझिये - जिस जिज्ञासु ने भगवत्साक्षात्कार हेतु ब्रह्मचिन्तन उपाय का उपयोग कर लिया, समझ लो कि उसने सभी उपायों(साधनों) का प्रयोग कर लिया; क्योंकि लोक में हम देखते हैं कि समस्त प्रजा एक राजा के ही अधीन होती है । यह ब्रह्मचिन्तन उपाय भी भगवत्प्राप्ति के सब उपायों का राजा ही है ॥१४॥
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परा पश्यंति मध्यमा, हृदये होइ बिचार ।
सुन्दर मुख तैं बैखरी, बांणी कौ बिस्तार ॥१५॥
चतुर्विध वाणी में से परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा - इन तीन वाणियों से हृदय में ब्रह्म का चिन्तन होता है और चतुर्थ वैखरी वाणी से उस ब्रह्म का विस्तार(व्याख्यान) होता है ॥१५॥ (तु०- सवैया : २६/८)
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सुन्दर रूप रहै नहीं, रूप रूप मिलि जाइ ।
एक अखंडित आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
लौकिक रूप, विनाशी होने के कारण, स्थायी नहीं है; वह एक न एक दिन विश्वरूप में मिल ही जायगा । तब शेष में अखण्ड आत्मा रहेगा जो सर्वत्र व्यापक(समाया हुआ) है ॥१६॥
(क्रमशः)

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