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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ४५/४८*
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*विरही प्राणी चकोर है, विरहा अग्नि अँगार ।*
*रज्जब जारे और को, उनके प्राण अधार ॥४५॥*
विरही प्राणी चकोर पक्षी के समान हैं, विरह अग्नि के अँगारों के समान है । अग्नि के अँगारे अन्य को तो जलाते हैं किन्तु चकोर के भोजन रूप होने से प्राणाधार हैं, वैसे ही विरह अन्य को तो दु:ख-प्रद होता है, किन्तु भगवद्-विरही भक्तों का तो जीवन रूप होता है ।
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*विरही बेहरे विरह बिन, जे उर पावक नांही ।*
*रज्जब यथा समुद्रजिव१, जीवे ज्वाला माँहिं ॥४६॥*
यदि हृदय में विरहाग्नि न हो तो विरही हृदय फटने लगता है, जैसे अग्निकीट१ अग्नि की ज्वाला में ही जीवित रहता है, अग्नि बिना मर जाता है, वैसे ही विरही विरह बिना नहीं जी सकता ।
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*विरही सावित विरह में, विरह बिना मर जाइ ।*
*ज्यों चूंने का कांकरा, रज्जब जल मिल राइ१ ॥४७॥*
चूने के कंकर पर जब तक जल न पड़े तब तक ही वह साबित रहता है । जल पड़ते ही उसमें दरार१ पड़ती है और वह फूट जाता है, वैसे ही विरही भी विरहावस्था में ही ठीक रहता है, विरह न रहने पर मर जाता है ।
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*इश्क अल्लाह मलंग२ मन, दिल दरूंन१ बिच चौक ।*
*रज्जब मंजिल३ आशिकां, अजब४ बिना लद५ शौक ॥४८॥*
हृदय रूप भीतरी१ चौक में परमहंस२ का मन ईश्वर के विरहयुक्त प्रेम में निमग्न रहता है, यह विरह ही प्रेमियों के ठहरने का स्थान३ है । इस विलक्षण४ विरह के बिना विरही-जनों पर महान शोक रूप भार आ पड़ता५ है, जिससे व्यथित होकर रोते रहते हैं ।
(क्रमशः)

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