मंगलवार, 19 मई 2026

सरवरि मरजीवौ डुबकी देइ

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग ।*
*दादू पीवैं राम रस, रहैं निरंजन लाग ॥*
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*साधु ॥*
सरवरि मरजीवौ डुबकी देइ । राम रसन मंझा थैं लेइ ॥टेक॥
डोरी लागौ आवै जाइ । सुखसागर मैं डूभी खाइ ॥
अघट सरोवर सुख सागरा । मुक्ता मोती रतनांवरा ॥
सुर नर हंसा केलि कराहिं । मुनि जन मंछा मांहि रहाहिं ॥
चित चकवा मनि आनंद होइ । उदै अस्त पख नाहीं कोइ ॥
बिगस्यौ कँवल कियौ परकास । भवर गुंजारै बीध्यौ बास ॥
नींची थाघ न ऊँचौ थाइ । सागर महिमा कही न जाइ ॥
बिलसै बस्त समद की आणि । बषनां सो मरजीवौ जाणि ॥१२४॥
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मरजीवा रूपी साधक रामनाम-साधना रूपी सागर में डुबकी लगाता है = परमात्मा की अनन्यभावेन साधना करना प्रारम्भ करता है । फिर उस रामनाम को रसना से अंतःकरण से एकाकार करके रटता है । जिसप्रकार मरजीवा रस्सी के सहारे सरोवर में उतरता है ऐसे ही साधक लै = अखण्डाकारवृत्ति के साथ रामनाम का स्मरण करता है ।
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जिस प्रकार मरजीवा सरोवर में नीचे तक जाकर वस्तु को ढूंढता है ऐसे ही साधक परमात्मा में सर्वतोभावेन डूबकर = निमग्न होकर साधना करता है । वह सरोवर रूपी निराकार परमात्मा सुखों का असीम सागर है । उसमें मुक्ता-मोती, रत्नों का अंबार = खजाना है । परमात्मा में डूबने से मुक्ति रूपी मोती, रत्न मिलती है । उस परमात्मा रूपी समुद्र में सुर और नर रूपी हंस केलि करते हैं = रसानंद लेते हैं ।
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मुनिजन रूपी मत्स्य सदैव उसी में निवास करते हैं =निमग्न रहते हैं । चित्त रूपी चकवा परमानन्दित हो जाता है क्योंकि प्रतिबंधक रूपी चन्द्रमा का न उदय होता है और न वह अस्त ही होता है । सहस्त्रदल कमल खुल जाता है । अनंत कोटि सूर्यों के समान वहाँ प्रकाश हो जाता है । जहाँ साधक रूपी भँवरा परमात्मदर्शन = अनुभव रूपी सुगंधि में बीध्यौ = निमग्न हो जाता है ।
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उस परमात्मा रूपी सागर की न नीचे की सीमा का पता लगता है और न ऊपरी सतह का ही भान हो पाता है । उस परमात्मा रूपी सागर की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती । बषनां कहता है, यथार्थ मरजीवा वह है जो समुद्र में से वस्तु = रत्न ले आवे और उसका उपयोग करे । साधक वह है जो साधना करके परमात्मा का अपरोक्षानुभव कर ले और सदैव उसी में अखंड रूपेण निमग्न हुआ रहे ॥१२४॥

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