🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार ।*
*बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥*
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*शूरातण ॥*
राम रसि रातौ मनाँ खेत बुहारै रे ।
अरिदल परदल पांचौं पारै, सहजि सुरति सौं मारै रे ॥टेक॥
सील सनाह खिमां करि खेड़ी, सत हथियार सँवाहै रे ।
कपट किवाड़ कनारै कीया, बिसर्यौ पांचौं बाहै रे ॥
लागै लड़ै पड़ै फिरि ऊठै, अंतरि इसी उभारै ।
बिकराल भुवाल अखाड़ै ऊतरि, हरि हरि कहै न हारै ॥
साच सोर तिहि ठौर सुरति दे, ब्रह्म अग्नि सौं लाया ।
काम किरोध पलीतै पहलै, गुर कै ग्यानि गुड़ाया ॥
हूई हबसधबस धरणी मैं, नादैं गगनैं गाज्या ।
जीती राड़ि तहाँ मन हार्यौ, अनहद बाजा बाज्या ॥
गंग जमुन बिचि अंतरि बेध्या करणाँ था सो करिया ।
बषनां बिड़द दियौ हरि त्याँहनैं, झूझ्या ते ऊबरिया ॥१२७॥
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साधक रूपी शूरवीर राम-नाम के रस में निमग्न होकर मन रूपी खेत में से नाना वासनाओं रूपी झाड़-झंखाड़ों को उखाड़-उखाड़ कर बाहर करता है । पाँच = शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध रूपी शत्रुसमूह के सैनिकों को सहज = वशीकृत मनोवृत्ति से मारता है । साधक रूपी शूरवीर शील रूपी कवच पहनता है ।
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क्षमा की खेड़ी को सत रूपी हथियारों में लगाकर उन्हें हाथों में धारण करता है । (खेड़ी शुद्ध लोहे को कहा जाता था जो धारदार हथियारों को बनाने में काम आता था क्योंकि इस लोहे में लोच अधिक होने से धार अच्छी बैठती थी ।) कपट रूपी किंवाड़ों को हटाकर एक ओर करता है । बिसर्यौ = युद्ध में रत हुआ शूरवीर पाँचों अरिदल के उक्त योद्धाओं को बाहै = भगाता है । वे पुनः आकर लागै = अपना प्रभाव दिखाने का प्रयत्न करते हैं । यह शूरवीर उनसे लड़ता है, हारकर गिरता है किन्तु हार मानकर पड़ा नहीं रहकर उठता है और युद्ध करता है ।
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इस प्रकार से साधक रूपी शूरवीर अंतरि = अंदर ही अंदर शत्रुओं से लड़ता रहता है । लड़ाई का सिलसिला जारी रखता है । भयंकर युद्धस्थल में एकबार युद्धार्थ संनद्ध हो जाने पर ‘हर हर महादेव’ की ध्वनि रूपी राम-नाम स्मरण निरंतर करता हुआ शत्रुओं से हारता नहीं है । साच रूपी बारूद को सुरति रूपी युद्धस्थल में रखकर ब्रह्म रूपी अग्नि को जलाता है और काम, क्रोध आदि को गुरुज्ञान के पलीते से सर्वप्रथम गुड़ाया = भस्म करता है ।
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“काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवं ।
महाशनो महापाप्मा विध्देनमिहवैरिणम्॥”
शरीर रूपी धरती पर भयंकर हबस-धबस = मारकाट होती है जिससे गगन में नाद गूंजता है । शरीर में रामनाम की साधना तीव्रता पूर्वक होती है जिससे समस्त दुर्गुण दुराचार समाप्त हो जाते हैं । उनकी चीख चिल्लाहट होती है किन्तु रामनाम सहस्त्रार में पहुँचकर अनहद नाद सुनने लगता है । सहस्त्रार में अनहद नाद परिव्याप्त हो जाता है ।
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शूरवीर रूपी साधक मन रूपी शत्रु को हराकर जीत जाता है = परमात्मा को पा लेता है । खुशी का बाजा रूपी अनहद नाद बजता है । इड़ा-पिंगला के मध्य रहने वाली सुषुम्ना को बेधते हुए सुरति और शब्द सहस्त्रार में पहुँच गये । शूरवीर रूपी साधक को जो करना था सो कर लिया । अर्थात् शत्रुओं को मारकर अपरोक्षानुभूति करनी थी जो कर ली । बषनां कहता है जिन्होंने शत्रुओं से युद्ध किया है वे ही जीते हैं और हरि रूपी राजा ने इन्हीं सैनिकों को = साधकों का यशभाजन बनाया है = दर्शन दिया है ॥१२७॥

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