सोमवार, 25 मई 2026

*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१४. भयभीत भयानक का अंग ~१७/२०*
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*महर१ कहर२ सौं डरपिये, द्वै बिन दिल दिलगीर३ ।*
*त्रिविधि भांति त्रासे रहै, रज्जब पूरण पीर ॥१७॥*
दया१ और क्रोध२ दोनों से ही डरते रहना चाहिये, जो इन दोनों से रहित रहता है, वही मन उदासीन३ रहता है । जो मन वचन कर्म से डरता है, वही अन्त में पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त करके सिद्ध अवस्था को प्राप्त होता है ।
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*भय के भाजन१ में रहे, सुकृत सरीखा धन्न ।*
*जन रज्जब निर्भय भये, दह दिशि निकसे मन्न ॥१८॥*
भय रूप पात्र१ में ही पुण्य के समान धन रहता है अर्थात डरते रहने से ही पाप कर्म नहीं होते और पुण्य की रक्षा होती है । निर्भय होने मन दश इन्द्रिय रूप दशों दिशां से निकलकर पाप कर्म करने से प्रवृत होता है ।
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*भाव भक्ति भय बिन नहीं, भय बिन भजे न राम ।*
*रज्जब भय बिन भ्रष्ट ह्वै, भय बिन सरे न काम ॥१९॥*
भय बिना श्रद्धा तथा भक्ति नहीं होती, भय बिना कोई भी अज्ञानी राम को नहीं भजता, भय बिना इच्छानुसार पाप कर्म करके प्राणी भ्रष्ट हो जाता है, मृत्यु आदि के भय बिना मुक्ति रूप कार्य भी नहीं सिद्ध होता है ।
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*रज्जब सब डर निडर को, निर्भय को भय पूर ।*
*निर्संशय संशय घणा, प्रत्यक्ष प्राण हजूर ॥२०॥*
जो पाप कर्म से नहीं डरता उसके पिछे सभी प्रकार के भय लगे रहते हैं । जो ईश्वर से नहीं डरता उसके लिये सब विश्व भय से पूर्ण है । जो अपने को निर्संशय मानता है, उसमें बहुत संशय रहते हैं । ईश्वर, संत, शास्त्र और पाप कर्म से नहीं डरता, इच्छानुसार करता है उस प्राणी का फल उसके सामने प्रत्यक्ष ही आ जाता है ।
(क्रमशः)

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