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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढ़ै कोइ ।*
*दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥*
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राग सारंग ॥११॥भ्रमविध्वंश ॥
*मिसर येक रूड़ी कथा कही ।*
ऊंघै थी र बिछायौ लाधौ ता परि सोइ रही ॥टेक॥
मुख की पीक नैंन दिखलावै, अधरनि काजरि कारौ ।
तैं ज कही सो मेरै होती, तिहि मन खुसी हमारौ ॥
कंकन पूठि करन की चूरी, हार बन्यौ बिन तागै ।
जोर सुणैं ताकै यहु उपजै, ध्यान तहीं ठै लागै ॥
मानि मनावौ राधा प्यारी, एतौ हठ क्यूँ कीजै ।
तूँ ब्रिषभान बड़े की बेटी, तेरे ज्यायें जीजै ॥
मन हठ छाड़ि हसौ चित सनमुख, दोउँ घाँ अमृत पीजै ।
जदपी बैर होइ हिरदा मैं, तौ बैरि कुँ पीठि न दीजै ॥
कहै सहेली अहो जसोधा, बात सुणी कै नांहीं ।
बंसी बट की छाँही, गही हठि मेरी बाँहीं ॥
हौं सकुचनि बोली नांहीं, बहु सखियन की भीर ।
गहि अचला मोहि ले चल्यौ, मान सरोवर तीर ॥
तेरै संग की ग्वालनी, मेरे संग के ग्वाल ।
एक एक कौं घेरिहैं, तब व्है है कौंन हवाल ॥
जहाँ जहाँ पग तूँ धरै, तहाँ तहाँ मन साथ ।
आप रहै आधीन व्है, चित बित तेरैं हाथ ॥
हठि बीरी मेरे मुखि दई, ग्रीबाँ मेल्ही बाँह ।
मिसही मिस मोहि ले चल्यौ, गहि अंधियारा माँह ॥
याही ग्यान ध्यान भी याही, नर नारी कौं भावै ।
बषनां देखि ब्यास की कथणी, साच न हिरदै आवै ॥१३२॥
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कथावाचक मिश्र ने एक सुंदर कथा कही । राधा बैठी-बैठी ऊंघ रही थी कि उसको किसी के द्वारा बिछाया हुआ बिछौना मिल गया जिसपर वह आराम से सो गई । पान खाने से उत्पन्न पीक = लाली उसके होठों पर न दीखकर नयनों में दीख रही थी । इसी प्रकार नेत्रों में लगी काजल नेत्रों में न दीखकर होठों पर दीख रही थी ।
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वस्तुतः ऊंघती हुई राधा संसार और भगवान दोनों के मार्गों पर चलती हुई चित्तवृत्ति है जो न पूर्णतः संसार में ही लगी हुई है और न पूर्णरूपेण परमात्मा में ही अनुरक्त हुई है । गुरु के द्वारा उपदेश ही किसी के द्वारा बिछाया हुआ बिछौना है । परमात्मा में चित्तवृत्ति का पूर्णरूपेण लग जाना ही सुखपूर्वक सोना है । परमात्मा के विरह में आंखों का रो रोकर लाल हो जाना ही मुँह की लाली आँखों में होना है । रोने से आंखों का काजल बहकर अधरों तक आता है यही ‘अधरनि काजरि कारौ’ है ।
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बषनांजी कहते हैं पंडित द्वारा कही गई बात भ्रम है (प्रथम अर्थ) किन्तु हमारे द्वारा अध्यात्मपरक लगाया गया अर्थ ही पंडित को अभिप्रेत है तो हे पंडित ! जो बात तूने कही है, यदि उसी के अनुसार मेरी स्थिति हो जाये तो मेरा मन परमानंद में सरावोर हो जाये । परमात्मा की भक्ति में चित्तवृत्ति के लग जाने से हाथ में पहने जाने वाली चूड़ियाँ और कंगन जो बंधन के प्रतीक है पीछे हो गये, अबंधनकारी हो गये । गले को बांधने वाला हार बिना धागे की लै बन गयी ।
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अर्थात् चित्तवृत्ति का परमात्म-नाम से बिना किसी व्यवधान के तादात्म्य हो गया । जो भी इस रूपक को सुनता है, उसके मन में भी ऐसा ही करने की इच्छा जागृत हो जाती है और उसकी भी चित्तवृत्ति भगवन्मय हो जाती हैं । (तहाँ ठै = उसी स्थान में = परमात्मा में) आगे राधा कृष्ण की लीला का वर्णन है । जिसे भी आध्यात्मिक अर्थ में घटाया जा सकता है ।
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कृष्ण राधा से कहते हैं, हे प्यारी राधा ! अब आप अपने मन को ठंडा करो । इतना अधिक हठ क्यों कर रही हो । अरे ! तुम तो वृषभानु जैसे बड़े गोप की बेटी हो । उनका प्रभाव बहुत भारी है । वे चाहें जिसको जीवनदान दे दें तथा वे चाहें जिसको मरवा देवें । तू है तो उन्हीं की लाड़ली । तेरे पास भी उनके बराबर ही शक्ति है । अतः मैं तो तेरे जिलाने से ही, तेरे द्वारा दिये हुए जीवनदान से ही जीता हूँ । मन में से हठ को निकाल दे ।
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सामने देखते हुए हँस जिससे कि हम दोनों दोनों ओर से = एक दूसरा एक दूसरे के दर्शन लाभ रूपी अमृत का पान कर सकें । हे राधा ! नीति कहती है, हृदय में बैरभाव होने के उपरान्त भी बैरी के सन्मुख हो जाने पर = बैरी के विनीत हो जाने पर उसे पीठ नहीं दी जाती = त्यागा नहीं जाता । प्रत्युत उसको अपना लिया जाता है । अब कृष्ण की लीलाओं के बारे में एक सखी यशोदा से जाकर कहती है ।
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अहो यशोदा ! तूने तेरे पुत्र की अचरजभरी बात सुनी अथवा नहीं । वह वंशीवट की छाया में वह छुपकर खड़ा हुआ था । मैं जैसे ही उधर से गुजरने लगी, कृष्ण ने जबरदस्ती मेरी बाँह पकड़ ली । मेरे साथ में बहुत सी सखियाँ और थीं । इसकारण संकोचवश मैं उससे कुछ भी नहीं कह सकी । श्रीकृष्ण मेरी फरिया का पल्ला पकड़कर मुझे मानसरोवर की तीर पर ले गया । वहाँ वह मेरे से कहने लगा~
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तेरे साथ की सारी ग्वालिनों को मेरे साथ के एक-एक ग्वालबाल, एक-एक को पकड़ लेवें तो बता तुम सबका फिर क्या हाल होगा । जहाँ-जहाँ तू जाती है, वहाँ-वहां तेरे साथ ही मेरा मन भी जाता है । यह मेरा मन तेरे अधीन होकर रहेगा और चित्त = वृत्ति तथा धन-माल-खजाना सब तेरे हाथों में रहेगा । अर्थात् जहाँ जहाँ तू रहेगी वहाँ वहाँ ही मेरा मन रहेगा । मेरा मन तेरे अधीन रहेगा । तू स्वामिनी होगी । मन, धन-सम्पत्ति सब तेरी आज्ञा के अनुसार चलने वाले होंगे । इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कहते-कहते जबरदस्ती करते हुए पान का बीड़ा मेरे मुख में दे दिया ।
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मेरी गर्दन पर अपनी बाँह रख दी और बातें करता हुआ मिस ही मिस = भुलावे में डाले हुए पकड़कर मुझे गहन अंधकार की ओर लेकर चला गया । नर-नारियों को वस्तुतः इस प्रकार का ही ज्ञान, ध्यान रुचिकर लगता है क्योंकि मिश्र के दृष्टिकोण से भी यही ज्ञान, ध्यान है तथा मिश्र की कथा सुनने वाले श्रोताओं के अनुसार भी यही ज्ञान-ध्यान है । बषनां कहता है व्यास की उक्त कथा को सुनकर कभी भी हृदय में सत्य स्थापित नहीं हो सकता ॥१३२॥

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