शुक्रवार, 15 मई 2026

विनती ॥


🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*दादू दरिया यहु संसार है, तामें राम नाम निज नाव ।*
*दादू ढील न कीजिये, यहु औसर यहु डाव ॥*
================
विनती ॥
भौ जल तिरणाँ भार भारी । 
लोह की नाव कैसैं तिरै मुरारी ॥टेक॥
लोह की नाव लोह भरि हाकी । 
खेवट बिना बिचालै थाकी ॥
थाग नहीं भौसागर मांही । 
वार पार क्युँह सूझै नांहीं ।
लोभ लहरि बषनां बलिहारी । 
ज्यूँ ज्यूँ भीजै त्यूँ त्यूँ भारी ॥१२०॥
हे मुरारी ! मुझे भव रूपी सागर से पार होना है किन्तु पापों के भार से मैं इतना भारी हो गया हूँ कि अपने बल पर इसको लांघ नहीं सकता । मेरे पास भाव भक्ति रूपी लकड़ी से निर्मित नाव नहीं है कि जिसमें बैठकर पार हो जाऊँ । मेरी नाव तो कर्मादि जन्य पाप रूपी लोहे की बनी हुई है । अतः बताइये हे मुरारी ! मेरी नाव कैसे तिर सकती है । मैंने पापकर्म रूपी लोहे की नाव में विषयवासना रूपी लोहे को ही भरकर समुद्र में पार होने की चला दी किन्तु बिना गुरु रूपी खेवट के वह नाव मध्य में आकर रुक गई ।
.
भवसागर की कोई थाघ नहीं है, गहराई का पता नहीं है । फिर वह कितना लम्बा चौड़ा है इसका भी पूरा अनुमान नहीं लग पा रहा है । इतने के ऊपर लोभ रूपी लहर बीच में अटकी नाव को डगमगाती है । जैसे-जैसे वह नाव विषयभोगों रूपी जल से भीगती है वैसे-वैसे वह भारी होती जाती है । अर्थात् डूबने की ओर अग्रसर हो रही है । अतः हे मुरारी ! कोई ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं भवसागर से तिर जाऊँ ॥१२०॥   

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें