शनिवार, 30 मई 2026

मोहि सबल भरोसा राम का

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥*
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भक्तमहिमा ॥
मोहि सबल भरोसा राम का ।
परचा सूँ सेवियै परमेसुर, आन धरम किस काम का ॥टेक॥
नामाँ परि सुलतानी कोपे, ले गये मांडौ मीर का ।
मूई गाइ जिवाई कैसौ, बडा मता बै बीर का ॥
कासी मांहि सिकन्दर तमक्यौ, गल मैं डालि जंजीर का ।
जिनिकौं आइ मिले परमेसुर, बंधन काटि कबीर का ॥
पंडित कोपि सबै खड़ि आये, ठाकुर लिया रैदास का ।
ऊपरि करिकैं गोद पधारे, पंडित गये निरासका ॥
जब न्रिप खिजे ढील क्यूँ लाई, पठ्यौ दूत कहि बैंन का ।
जन कै बदलै तेल लगायौ, कारिज सार्यौ सैंन का ॥
भवन भगत परि घाट घड़ी मिलि, काठ पलटि भयौ सार का ।
पीपा नैं दोइ देही दीनी, इक टोडै इक द्वारका ॥
धनाँ भगत कौ खेत निपायौ, खाटू हस्त झुकाइका ।
रह्यौ ठग्यौ सौ निकसे स्वामी, दादूजी गछ नाइका ॥
साट महोछा श्रीसांभरि मैं, द्वारै द्वारै ब्यौति का ।
जन अपना कौ बिड़द बुलायौ, सबकै जीमें न्यौंति का ॥
तुलसी बाह्मणि चुगली कीन्हीं, दादू है आंबेरि का ।
अकबर कहै बेगि ले आवौ, दरस करौं तीन केरि का ॥
जोर करै ताही कौं मारै, ठाकुर है लघु लीन का ।
बषनां कहै सूनौं भाइ संतौं, यहु मारग है दीन का ॥१३५॥
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बषनांजी कहते हैं, मुझे सबल = सर्वसमर्थ ‘कर्तुंअकर्तुंअन्यथाकर्तुम्’ समर्थ परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की भक्तवत्सलता पर पूर्ण विश्वास है । अतः उस परमेश्वर को ही पूर्णनिष्ठा, श्रद्धा-विश्वास के साथ भजिये । उसके भजन स्मरण के अतिरिक्त अन्य धर्मों का अनुष्ठान किस काम का है ? अर्थात् अन्यों से प्रयोजन रखना व्यर्थ है ।
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स्वयं मुसलमानों ने गाय मारकर नामदेव पर इल्जाम लगा दिया कि नामदेव ने गाय मार दी । मांडूगढ़ का मीर शिकायत मिलने पर नामदेव पर क्रोधित हुआ । सेवकों द्वारा नामदेव को पकड़कर अपने दरबार में बुलाया । नामदेव से कहा, यदि तुमने गाय नहीं मारी है तो इसे जीवित कर दो अन्यथा तुम्हें गाय मारने का दंड भुगतना पड़ेगा । तत्काल केशव ने मृत गाय को जिला दी । उस नामदेव नामक भक्त का मता = विश्वास, सिद्धान्त अटल था जिसके वशीभूत होकर भगवान् ने उसकी लाज मांडूमीर के दरबार में रखी ।
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काशी में सिकन्दर कबीर के ऊपर क्रोधित हुआ । उसने कबीर के गले में वजनी जंजीर डाल कर गंगा में डुबो दिया किन्तु तत्काल परमात्मा कबीर से आकर मिले और उन्होंने जंजीर के बंधनों को काटकर कबीर को गंगा के बाहर सुरक्षित पहुँचा दिया ।
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काशी के समस्त पंडित क्रोधित होकर अपने अपने स्थानों से निकलकर रैदास के घर पहुँच गये और उन्होंने रैदास द्वारा पूजित विग्रह को छीन लिया । राजा की सभा में से वह देवविग्रह बीच में से उठकर आकाश मारग में होकर तत्काल रैदास की गोदी में आकर बिराज गये । इससे सारे पंडित लज्जित होकर अपने अपने घरों को निराश ही लौट गये ।
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सेन नाई द्वारा तैल मदनार्थ समय पर न पहुँचने पर जब बांधवगढ़ का राजा सेन पर क्रोधित हुआ तथा लाने को दूत भेजे गये तब भक्त सेन के बदले में भगवान् स्वयं ने तैलमर्दन करके भक्तप्रवर सेन नाई को राजा का कोपभाजन बनने से बचा लिया ।
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भक्त भुवन चौहान पर जब चितौड़ दरबार में अन्य दरबारियों ने षंड्यंत्र रचकर आरोप लगाया कि वह लोहे की तलवार न रखकर काठ की तलवार रखता है । राजर्षि पीपा को भगवान ने एक द्वारिका में चंदोवे में लगी आग को बुझाने को तथा दूसरी टोड़ा के जागीरदार की सभा में उपस्थित रहने के लिये दो शरीर प्रदान किये थे । भगवान् ने ही धनाँ भक्त का खेत बिना बीज बोये ही निपजाया था ।
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खाटू में दादूजी महाराज पर दुष्टों ने मदमस्त हाथी को झुकाया = मारने के छोड़ा किन्तु वह मदमस्त हाथी ठग्यौ सो = हतप्रभ हुआ खड़ा ही रहा । उसने दादूजी पर कोई प्रहार नहीं किया । वे स्वामी दादूजी आराम से उसके सामने से निकल गये । सांभर में सात व्यक्तियों ने अपने अपने घरों पर महोत्सव किये और दादूजी महाराज को सभी ने अपने यहाँ पधारने का निमंत्रण दिया । परमात्मा ने अपने भक्त की महिमा सातों स्थानों पर एक साथ पधार व जींमकर बढ़ाई, प्रकट की ।
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तुलसी नामक ब्राह्मण ने अकबर से चुगली खाई कि निर्गुण-निराकार-परमात्मा का प्रचार-प्रसार करने वाला दादू आंबेर में रहता है । तब अकबर ने कहा उसे तत्काल बुलावो । मैं उसका दर्शन करना चाहता हूँ, वार्तालाप करना चाहता हूँ ।
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दादूजी व अकबर ४० दिन तक सत्संग हुआ और वह परम संतुष्ट हुआ । जो भी भक्तों पर जोर जुल्म करता है उन्हीं को परमात्मा दंडित करता है क्योंकि वह लघु लीन = निर्बल भक्तों का रक्षक है । बषनां सभी संतों से कहता है, हे भाइयों ! परमात्मा की भक्ति करना, उसकी शरण का आश्रय ग्रहण करना तथा उसके शरणागतवत्सलत्व पर पूर्ण विश्वास करना ही सच्चा धर्म है । इसके अतिरिक्त सारे धर्म व्यर्थ हैं ॥१३५॥

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