🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ ।*
*जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥*
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राग मल्हार ॥१०॥ गुरु वियोग जन्य विरह ॥
बिछड़्या रामसनेही रे । म्हारै मन पछतावो एही रे ॥टेक॥
बीछुड़ियाँ बन दहिया रे । म्हारै हियड़ै करबत बहिया रे ॥
बिलखी सखी सहेली रे । ज्यूँ जल बिन नागर बेली रे ।
व मुलकनि की छबि छाँही रे । म्हारै रहि गई हिरदै माँही रे ॥
कोइ उहि उणिहारै नांही रे । हौं ढूंढि रही जग मांही रे ॥
अब फीकौ म्हारै भाँई रे । मँडली कौ मंडण नाँही रे ।
कौंण सभा मैं सोहै रे । जाकी निर्मल बाणी मोहै रे ॥
भरि भरि प्रेम पिलावै रे । कोइ दादू आणि मिलावै रे ।
बषनां बहुत बिसूरै रे । दरसणि कै कारणि झूरै रे ॥१२८॥
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यह पद बषनांजी ने दादूजी महाराज के परलोकगमन के उपरान्त वियोग जन्य विरह के अत्यधिक उत्पन्न होने पर बनाकर गाया था । इस पद में व्यक्त भावनाओं से लगता है बषनांजी का दादूजी के प्रति मानसिक लगाव तो था ही शारीरिक लगाव भी कम नहीं था । उनके तन-मन और वचन तीनों में ही दादूजी समाये हुए थे ।
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वे कहते हैं, राम से स्नेह करने वाले दादूजी महाराज आज मुझसे शरीररूपेण बिछुड़ गये हैं । मेरे मन में इसका गहरा पश्चाताप = दुःख है । उनके बिछुड़ जाने से मेरा मन रूपी वन धधक रहा है । ह्रदय पर करवत = आरा फिर रहा है । हम सभी शिष्य-प्रशिष्य रूपी सखी-सहेलियाँ वियोग के कारण उसी प्रकार बिलख-बिलख कर कुम्हला रही हैं जैसे बिना जल की नागरवेल कुम्हला जाती है ।
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दादूजी महाराज की मुस्कराती हुई उस आकृति की मेरे हृदय में अब प्रतिकृति(छाँही) मात्र ही रह गई है । उनकी जैसी आकृति अब संसार में और कोई रही नहीं है । मैं विरहणी उसको पूरे संसार में ढूंढ रही हूँ । मेरे लिये(म्हारै भाँई) सारा संसार ही सारहीन हो गया है क्योंकि मेरी मंडली को शोभा देने वाला प्रधान अब इस दुनिया में नहीं रहा है ।
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अब ऐसा कौन है जो रामसभा में शोभायमान होगा = विराजेगा जिसके निर्मल उपदेशों से संसार-सागर में डूब रहे अज्ञानी लोग प्रभावित होकर राम-रस-रसिक बनेंगे । वे राम-रस में छके राम प्रेम का रस सभी को प्याला भरकर पिलाते थे । ऐसे दादूजी को कोई पुनः लाकर मुझसे मिलादे, बस यही हृदयेच्छा है । बषनां उनको पल-पल, क्षण-क्षण बिसूरता है = याद करता है । उनके दर्शन नहीं हो रहे हैं, इस कारण सदैव झूरै = रोता रहता है ॥१२८॥

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