सोमवार, 1 जून 2026

काँयौं डर छै रे घर बार कौ

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सब जग मांही एकला, देह निरंतर वास ।*
*दादू कारण राम के, घर वन मांहि उदास ॥*
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भेष ॥
*काँयौं डर छै रे घर बार कौ ।*
ज्याँह के हिरदै हरि कौ सुमिरण, ता डर नहीं लगार कौ ॥टेक॥
काँयौं घर काँयौं बन मांहीं, यहु छै काम बिचार कौ ।
बैराग लियाँ की कौंण बडाई, जे भार बहै संसार कौ ॥
तनि बैरागी मनि घरबारी, दीठौ ग्यान गवार कौ ।
थोड़ी छोडि घणेरी लागौ, पसारौ सैंवार कौ ॥
चरण चितारै हिरदै धारै, गुर गमि ग्यान अपार कौ ।
तिहि नैं करम न लागै कोई, वो साहिब का दरबारि कौ ॥
सुवा पढावत गनिका तारी, जिहि कै बणिज बिकार कौ ।
अजामेलि से अधम उधारे, जिनि नाम लियौ करतार कौ ॥
घर मैं होते नाम कबीरा, अरु रैदास चमार कौ ।
घर मांहै हरि का गुण गावै, बषनां सिरजनहार कौ ॥१३७॥
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कहते हैं, दादूजी के समतापूर्ण बर्ताव पर उनके शिष्यों में यह चर्चा चली कि बषनांजी गृहस्थ हैं जबकि हम विरक्त हैं ।  फिर भी दादूजी महाराज बषनांजी को भी उतना ही मान सम्मान देते हैं जितना हमको देते हैं । सिद्धांततः महत्व हमको ज्यादा मिलना चाहिये । 
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यद्यपि दादूजी अपने शिष्यों की इस चर्चा से प्रसन्न नहीं थे तथा वे स्वयं भी इसका उचित उत्तर दे सकते थे किन्तु उन्होंने इसका उत्तर बषनांजी से ही उक्त पद के माध्यम से दिलवाया है जिसका स्पष्ट संकेत है कि मात्र स्त्री का परित्याग करके साधु के से वस्त्र पहन लेने से कोई साधु नहीं हो जाता । साधु होने के लिये मन में से विषय-विकारों के प्रति विद्यमान सूक्ष्म से सूक्ष्म राग को भी निकाल देना होता है । 
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विरक्त वह नहीं है जो एक घर को छोड़कर अनेकों मठ मंदिर बनाता और संचालित करता फिरे । वस्तुतः विरक्त तो वह है जिसके मन में से संसार ही नहीं ब्रह्मा के लोक तक के समस्त सुखों के प्रति राग समाप्त हो जाता है । गीता में कहा गया है विषय स्थूल रूप से तो निवृत्त हो जाते हैं किन्तु सूक्ष्म रूप से उसमें राग विद्यमान रह जाता हा जो ही सबसे बड़ा घातक है । यही प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग की भित्ति है । बषनांज ने इस प्रवृत्ति वाद तथा निवृत्तिवाद पर बहुत ही सुंदर विवेचन इस पद में किया है । 
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“विषया विनिवर्तंते निराहारस्य देहिनः । 
रसवर्जरसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।” 
२|५९ । गीता ॥ 
“कहणी का कहिये भगत, रहणी का संसार । 
रामचरण वै पावसी, जम दरघै बहुमार ॥” 
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घरबार का होना किसी डर का कारण नहीं है । अतः घरबार होने में किस बात का डर है । जिनके हृदय में अहर्निश राम-नाम का स्मरण चलता रहता है, उन्हें घरबार से तनिक भी डर नहीं है । उनके लिये क्या तो घर में रहना और क्या जंगल दोनों ही बंधनकारी भी हो सकते हैं तो अबंधनकारी भी हो सकते हैं । जब अनित्यता का विचार करके घर को छोड़ा जाता है तब तो वह अबंधनकारी होता है किन्तु जब वहीँ घर बिना विचार किये छोड़ा जाता है तब वह बंधनकारी हो जाता है क्योंकि जंगल में रहने पर भी घर गृहस्थ के प्रति राग निवृत्त नहीं होता है । 
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अतः यह विचार का विषय है । भौतिक रूप से त्यागने अथवा न त्यागने का नहीं है । उस वैराग्य धारण करने का क्या महत्व है जिसमें सांसारिक क्रियाकलापों से पीछा नहीं छूटता है । वैरागी संसारी की तरह रामभजन न करके मकान, खेती, धन, दौलत की व्यवस्था करता रहे । वह ज्ञान तो गँवार के ज्ञान के सदृश है जिसमें व्यक्ति शरीर से तो भेष पहनकर वैरागी बन जाता है किन्तु काम से घरबारी ही बना रहता हाउ, प्रवृत्तिमार्ग का अवलम्बन किये रहता है । 
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ऐसा वैरागी एक घर की थोड़ी बहुत सम्पत्ति, शिष्य-प्रशिष्यों का समुदाय एकत्रित कर लेता है । उसका विस्तार सौ गुणा कर लेता है । इसके विपरीत गुरुपदिष्ट ज्ञानानुसार अपार = निर्गुण-निराकार-परमात्मा का जो सदैव चिंतन करते हैं, उसका स्मरण सदैव हृदय से करते हैं, उनको किसी भी प्रकार के परमात्मा द्वारा नियत किये गये कर्मों के फलभोग बंधनकारी नहीं होते है । क्योंकि वे वर्तमान कर्मों को अकर्त्ताभाव से प्रारब्धों को प्रभुप्रसाद समझकर करते भोगते हैं । सचितों ओ समाप्त करने के लिये सदैव भगवद्भजन करते हैं ॥ 
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“क्रीयमाण करिये नहीं, प्रारब्ध कर्म ले भोग । 
संचित ऊपर भजन कर, यौं छूटै भवरोग ॥” 
(श्रीरामजन वीतराग वाणी) 
जिस स्त्री का, गणिका का विषयभोग का व्यापार था, वह भी शुक के साथ राम-नाम का स्मरण करने से मोक्ष पाने की अधिकारिणी हो गई । अजामिल जैसा वेश्यागामी पतितब्राह्माण भी उद्धार को प्राप्त हो गया जिसने परब्रह्म-परमात्मा का नाम स्मरण अपने पुत्र के नाम के बहाने किया । घरबारी ही नामदेव तथा कबीर थे तो घरबारी ही रैदास चमार भी थे । घर में ही बषनां हरि सृजनहार के गुणों का गान करता है ॥१३७॥ 

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