🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू पीवै एक रस, बिसरि जाइ सब और ।*
*अविगत यहु गति कीजिये, मन राखो इहि ठौर ॥*
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राग बसंत ॥१२॥रहति(रहनी) ॥
मेरे मन कै मानें मोहनलाल ।
तोहि मिलन का मोहि बहुत ख्याल ॥टेक॥
भवर भवैं बन रवैं नाहिं । वाकी निरति निवासै कवल माहिं ॥
यौं मेरा मन लागा तोहि । नैंकक मिलणैं दीजै मोहि ॥
कुंज चितारै धरणि छेव । सित नित राखै करै सेव ॥
यौं मेरा मन चरन जाइ । लालचि लागौ रहै लुभाइ ॥
सीप समदाँ जल मँझारि । वा जल सौं नांहीं हेत प्यारि ॥
स्वाति बूंद की रटै प्यास । यौं मेरा मन हरि की आस ॥
चातृग कै चित बहुत चाइ । रटतौ डौलै तिस न जाइ ।
यौं बषनां बोलै बारबार । मोहि दरस दिखावौ एक बार ॥१३९॥
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मन को मोहित कर लेने वाले हे मोहनलाल मेरे मन ने अब तुझको सर्वांश में अपना मान लिया है; तुझे अपना करके स्वीकार कर लिया है । तुझसे मिलने की मेरी बहुत भारी इच्छा है । जिस प्रकार भौंरा पूरे बन में भ्रमण करता है किन्तु उसमें कहीं भी रमता = स्थिर होकर टिकता नहीं है क्योंकि उसकी चित्तवृत्ति तो कमल में अटकी रहती है । इसी प्रकार मेरा मन तुझमें लग गया है । मुझको मिलने का किञ्चित अवसर तो प्रदान कर ।
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कुंजी नामक पक्षी अपने अंडों को समुद के किनारे मिटटी में दबा देती है और स्वयं इधर-उधर भ्रमण करने चली जाती है किन्तु उसकी चित्तवृत्ति उन अंडों में ही लगी रहती है । वह दूर रहकर भी अपनी चित्तवृति की तन्मयता से उन्हें सेती रहती है = पकाती रहती है । ठीक इसी प्रकार मेरा मन भी आपके चरणों में लगा रहता है । वह आपके दर्शनों के लालच से ललचाया हुआ सदैव आपके चरण कमलों के चिंतन में ही निमग्न रहता है ।
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सीप समुद्र के जल में रहती है किन्तु उस जल से तनिक सा भी हेत प्रेम नहीं करती है । वह तो स्वाति नक्षत्र के जल-वर्षा की ही आशा करती रहती है । ठीक इसी प्रकार मेरा शरीर रहता तो संसार में है किन्तु मेरा मन सदैव आपके चित्त में लगा रहता है । सदैव आपके दर्शनों की आशा करता रहता है ।
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चातक के चित्त में स्वाति नक्षत्र के जल प्राप्त करने की अत्यधिक चाह होती है । वह सर्वत्र सर्वकाल में “पिऊ” “पिऊ” की ध्वनि ही करता फिरता है । फिर भी उसकी जलतृषा बुझती नहीं है । ऐसे ही मैं भी बारबार आपके नाम का स्मरण करता फिरता हूँ । हे प्यारे मनमोहन एकबार मुझको अपना दरस दिखा दे ॥१३९॥

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