शुक्रवार, 5 जून 2026

*रे चित चिंता जिनि करै, हरि चिंता करसी ।*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू राजिक रिजक लिये खड़ा, देवे हाथों हाथ ।*
*पूरक पूरा पास है, सदा हमारे साथ ॥*
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विश्वास ॥
*रे चित चिंता जिनि करै, हरि चिंता करसी ।*
भांडा घड़ि मुहड़ा किया, सोइ भलै भरसी ॥टेक॥
जठर अगनि मैं जीव की, जिनि करी संभाला ।
अब नाऊँ नांहीं करै, ओ दीन दयाला ।
आगाँ ही आगाँ लगैं, यौं करता आया ।
भुवंग पिटारा मांहि था, भख मारग पाया ॥
खूँहणि खपी अठारहुँ, भारथ बहुतेरा ।
अंडा राख्या घंट दे, सो साहिब मेरा ॥
सुरंजाम तिहूँ लोक का, ताकै करि छांड्या ।
सो मांहैं छिटकाइसी, बषनां मुख मांड्या ॥१४१॥
 
चित्त को विश्वास दिलाते हुए देते हुए कहते हैं, हे चित्त ! तू अपनी चिंता क्यों करता है । जिस हरि ने तुझे संसार में भेजा है, वह अपने आप चिंता करके तेरी सारी व्यवस्थाएँ करेगा । उस परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने शरीर रूपी भांडा बनाकर उसमें खाने के लिये मुँह बनाया है, तो वही उसको भरेगा भी । 
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जिस दीनदयाल ने माँ की जठराग्नि में जीव की पूरी सार-संभाल की थी, अब बाहर आ जाने पर सार-संभाल करने को मना नहीं करेगा । क्योंकि वह दीनों पर दया करने के स्वभाव वाला है । पूर्वकाल के पूर्वकाल से ही वह सारे ब्रह्माण्ड का उक्त प्रकार से ही भरण पोषण करता आ रहा है । अब उसके लिये यह कोई नहीं चीज नहीं है । 
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एक सर्प पिटारी में बंद था । कई दिनों से उसे भोजन नहीं मिला था । वह उस पिटारे से निकलना भी चाहता था तथा भोजन भी चाहता था । एक चूहे ने उस पिटारे को यह समझकर कुतर डाला कि इसमें खाद्यान्न होगा । सो उसने उसको कुतरा और भीतर घुस गया । सर्प को उसका भोज्य चूहा मिल गया । उसने उसे आराम से खाया तथा चूहे द्वारा किये गये छेद में से होकर वह बाहर भी निकल गया । 
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महाभारत के युद्ध से पूर्व कुरुक्षेत्र में एक टीटोड़ी ने अंडे देकर मिट्टी में दबा रखे थे । परमात्मकृपा से जिस जगह अंडे दब रहे थे उसी जगह हाथी के लटकी रहने वाली बड़ी घंटी = घंटा टूटकर गिर गया और वह पूरे अठारह दिन तक अठारह अक्षोहिणी सेना व उसमें लड़ने वाले समस्त वीरों के समाप्त होने तक वैसे के वैसे उन अंडों पर छत्र की भाँति पड़ा रहा जिससे वे सारे के सारे अंडे सुरक्षित रह गये । 
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बषनांजी कहते हैं, जो परमात्मा इस प्रकार की अनहोनी करने में समर्थ है, वही मेरा इष्ट है । तीनों लोकों की माकूल सुरंजाम = व्यवस्था उस परब्रह्म-परमात्मा ने एक व्यवस्थित तरीके से कर रखी है । इसी आशा से मैं बषनां ने अपना मुँह खोल रखा है, वह उसमें अपने आप छिटकाइसी = भोजन डालेगा । अर्थात् मैं पूर्णरूप से उसके आश्रय पर बैठा हुआ हूँ । वह अपने आप मेरी व्यवस्था करेगा ॥१४१॥

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