सोमवार, 8 जून 2026

जाहि जल्या मन जंजालि

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
.
*सजनी ! रजनी घटती जाइ ।*
*पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनो लाल मनाइ ॥*
*अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु अवसर चलि जाइ ।*
*यहु तन विछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछे ही पछिताइ ॥*
================
*उपदेश चांणक ॥*
जाहि जल्या मन जंजालि बिलूध्या । धंधै मैं केवल राम न सूझ्या ॥टेक॥
लेखा चोखा करत बिहावै, लेवा देवा सो सरणैं आवै ।
यौं ही करताँ जनम बदीतौ, भर्यौ आयौ होइ चाल्यौ रीत्यौ ॥
फिरि फिरि कीया मेरी मेरी, तामैं रती कछू नहिं तेरी ।
तिनसौं लागि जनम यौं हार्यौ, वेलाँ थकी न पंथ सँवार्यौ ॥
घटि गइ ताका भेद न पाया, मूरिख चेति बुढ़ापा आया ।
बखनां बहुत कहा ध्रिग जीया, केसौ भज्या न सुकृत कीया ॥१४४॥
.
नाना काम-धंधों रूपी जंजालों “गृह कारिज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥ में उलझे रहने से मन जलता जा रहा है । मन पहले से ही विषयों में आसक्त था । अब क्रमशः अधिक से अधिक और आसक्त होता जा रहा है, उलझता जा रहा है । घर के काम-धंधों में इतना व्यस्त हो गया कि निष्केवल = निर्गुण-निराकार, परात्पर-परब्रह्म परमात्मा की भक्ति करने का मन में विचार ही नहीं आया ।
.
जो सरणैं = आसामी-पालती लोग धन लेने-देने को आते हैं उनका लेखा-जोखा = हिसाब-किताब लिखने व सलटाने(नक्की = फाइनल करने) में ही सारा समय व्यतीत हो जाता है । इसीप्र कार करते-करते ही सारी जीवनावधि व्यतीत हो जाती है । मनुष्य पुण्य व समय रूपी धन से भरा हुआ आता है किन्तु भगवद्भजन न कर पाने के कारण परलोक में जाते समय खाली हाथ पुण्यहीन व समय गँवाकर जाता है ।
.
मनुष्य पुनः पुनः हर वस्तु को मेरी-मेरी करके कहता और मानता है किन्तु हे भोले मनुष्य ! उनमें से तेरी किञ्चितमात्र भी नहीं है । उन विरानों को अपना मानकर मनुष्यजन्म ठीक वैसे ही बर्बाद कर दिया जैसे आलसी(चलने में सुस्त) व्यक्ति का समय तो पूरा हो जाता है किन्तु रास्ता पूरा नहीं होता और रात्रि हो जाती है ।
.
जो आयु घट गई, समय व्यतीत हो गया उसका रहस्य मूर्ख मनुष्य जान नहीं पाया । अतः हे मूर्ख मनुष्य ! तेरी वृद्धावस्था आ गई है, अब तो सावधान हो जा । रामजी का भजन करने का दृढ निश्चय कर ले । बषनां कहता है, धिक्कार है, उस बहुत समय तक जीने को जिसमें न केशव का भजन किया और न पुण्य कर्म ही किये ॥१४४॥

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें