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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू मोह संसार को, विहरै तन मन प्राण ।*
*दादू छूटै ज्ञान कर, को साधु संत सुजाण ॥*
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राग भैरूँ ॥१७॥माया
तीधोधो भाई तीधोधो, चिति परै तौ तीधोधो ।
मुध परै तौ तीधोधो, दुहुँ पवाड़ाँ तीधोधो ॥टेक॥
ज्याँह कै नाँहीं त्याँहनैं रोज रुवावै, छै तो बहुत पचावै ।
संपति बिपति दोउ तीधोधो, इहि बिधि नाच नचावै ॥
एकाँ कै आगै व्है निकसी, सो सँगि लागा जावै ।
एकाँ कै बासै बसि चाली, तिनकौं चित्त लगावैं ॥
जे राची तौ तीधोधो, बिरची तौ तीधोधो ।
बषनां बहुत नचाया आगैं, जे उबर्या तो कोई को ॥१५०॥
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“तीधोधो” का सही शाब्दिक अर्थ क्या है, पता नहीं किन्तु प्रसंगानुसार ‘बुरा है’ अर्थ अमझ में आता है । स्वामी मंगलदासजी महाराज ‘ठीक है’ अर्थ की कल्पना करते हैं । यदि वे पूरे पद की व्याख्या करके ‘ठीक है’ अर्थ से संगति बैठाते तो हमें सुविधा होती । खैर ! पाठक अर्थ पढ़ें । इस पद में बषनांजी ने माया के धन-सम्पत्ति रूप को हेय बताया है । उनके अनुसार माया के अर्जन, रक्षण और व्यय तीनों में ही अनेक कष्टों को सहन करना पड़ता है । अतः उनके विचार से माया हरतरह से ही बुरी है । इन्हीं विचारों की प्रतिध्वनि है इस पद में ।
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माया बुरी है, हे भाई ! माया सर्वथा त्याज्य है । यदि इस माया के न होने पर इसके प्राप्त्यर्थ चिति परै = चित्त में चिंतन चलता है तो वह भी बुरा है । इसके विपरीत यदि माया के होने पर चित्त इसमें मुध = मुग्ध = आसक्त हो जाता है तो भी बुरा है क्योंकि इस मिथ्या माया का न होने पर चिंतन तथा होने पर इसमें आसक्ति दोनों ही बुरे हैं ।
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जिसके पास माया नहीं होती वे नित्य ही माया की प्राप्ति हेतु रोते हैं कि हाय ! हम हतभाग्य हैं जो हमारे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है । इसके विपरीत जिनके पास माया है उन्हें भी यह पचावै = परेशान करती है । राजा कर के रूप में, चोर चोरी करके, बलवान जबरदस्ती करके इस माया को छीन लेने का प्रयत्न करते हैं । अतः जिसके पास माया है, वह सदैव चिंता निमग्न रहता है कि कोई मुझसे इसे छीनकर न ले जाये । अतः सम्पत्ति तथा विपत्ति दोनों ही बुरी है । क्योंकि दोनों ही मनुष्य को नाना नाच नचाती हैं ।
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एकाँ कै =जिनके सामने से माया चली जाती ही वे इस माया के ही पीछे-पीछे दौड़ते हैं कि कैसे भी यह उनके घर में रुक जाये, आ जावे । इसके विपरीत जिनके घर में निवास करके वह चली जाती है वे भी अहर्निश इसके चिंतन में ही लगे रहते हैं । अतः यदि यह माया घर में रहती है तब भी बुरी है । और चली जाती है तब भी बुरी है इस माया ने पूर्वकाल में भी अनेकों को अनेक नाच नचाये हैं । कोई भगवद्भक्त ही इससे बच पाये हैं, वे विरले ही हैं ॥१५०॥

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