बुधवार, 17 जून 2026

राम-धन ॥

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*राम धन खात न खूटै रे,*
*अपरंपार पार नहिं आवै, आथि न टूटै रे ॥*
*तस्कर लेइ न पावक जालै, प्रेम न छूटै रे ॥*
*चहुं दिशि पसर्यो बिन रखवाले, चोर न लूटै रै ॥*
*हरि हीरा है राम रसायन, सरस न सूखै रे ॥*
*दादू और आथि बहुतेरी, तुस नर कूटै रे ॥*
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राम-धन ॥
सोइ निरधन जाकै राम धन नांहीं ।
राम धन ताकै निधि घर मांहीं ॥टेक॥
नाणा नाँव अमर संसारि । जिनि लीया ते उतरे पारि ॥
चोर न लागै मुसै न कोइ । लियाँ थैं लाभ घणाँ ही होइ 
खर्चताँ खाताँ ओड न आवै । सांच्याँ चारि पदारथ पावै 
आगैं यहु धन जिनकै हूवा । काल दुकालाँ नांहीं मूवा ॥
दूजा धन देखताँ बिलाइ । राम अखै धन कदे न जाइ ॥
चित चरवा भरि मेल्हा पाटि । हिरदै राख्या दिपै लिलाटि ॥
सो बोहरा बोहराँ मैं कहिये । जिहि घटि राम पदारथ लहिये 
आदि अंति लूँ खरचै खाइ । बषनां कै रामधन बिनसि न जाइ ॥१५१॥
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निरधन वह है जिसके पास रामनाम रूपी धन नहीं है । जिसके पास राम-धन है उसके घर में ही धन है, ऐसा मानना चाहिये । रामनाम रूपी नाणा = धन ही संसार में अमर = हमेशा रहने वाला धन है जिन्होंने भी इसका स्मरण किया है, वे ही संसार-सागर से पार उतरे हैं । इस राम-धन को कोई भी चौर चौरी नहीं कर सकता तथा कोई भी घाड़ायती इसको छीन नहीं सकता ।
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इसको लेने से, इसका स्मरण करने से अनेकों लाभ होते हैं । यह ऐसा अक्षय धन है कि खर्चने और खाने से इसका ओड = अंत नहीं आता । इसका संचय करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पदार्थों की प्राप्ति होती है ।
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पूर्वकाल में जिनके पास भी यह राम-नाम रूपी धन रहा है वे अकाल और दुष्काल के प्रभावों से सर्वथा अप्रभावित रहे हैं । अर्थात् उन्हें धर्मराज के यहाँ कष्ट भुगतने नहीं जाना पड़ा है । रामधन के अतिरिक्त अन्य सभी धन देखते-देखते ही नष्ट हो जाते हैं जबकि अक्षय रामधन कभी भी खत्म नहीं होता ।
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चित्त रूपी चरवे(चरु = जलादि भरने का पात्र) में इसको भरकर ऊपर से विषय विकार न आने देने रूपी ढक्कन से ढककर रखना चाहए । हृदय में इसको बसा लेने से ललाट देदीप्यमान हो जाता है । धन संचय करने व उधार देने वाले बोहरों में वास्तविक बोहरा यही है जिसके हृदय में राम-नाम रूपी धन विद्यमान होता है । बषनां प्रारम्भ से अब तक रोज इस रामनाम रूपी धन को खर्चता और खाता है फिर भी यह कम नहीं होता है, विनष्ट नहीं होता है ॥१५१॥

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