बुधवार, 10 जून 2026

प्राणीड़ा पाणी पायौ लोडै

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जे साहिब को भावै नहीं, सो जीव न कीजी रे ।*
*परिहर विषय विकार सब, अमृत रस पीजी रे ॥*
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उपदेश ॥
प्राणीड़ा पाणी पायौ लोडै, तौ इहै मति सांधी रे ।
मानसरोवर फूटैगौ रे, जे मनसा पालि न बांधी रे ॥टेक॥
पहिली बांधी पीछैं न छूटै, बांध्याँ ही बधि आवै रे ।
अब अैसी बांधी मन मेरा, तामैं पाणी बहुत समावै रे ॥
पाँच पचीस दसौं दिसि जाता, ए सब मांहै लीजै रे ।
नौ सै नदी नवासी नाला, उलटि अफूठा दीजै रे ॥
तीनि ताल तौ लगनिज ऊंडौ, चौथें सेझौ कीजै रे ॥
मुकती घाट सुरति पणिहारी, तहाँ हरि जल कलस भरीजै रे ॥
वा सरोवर कौ पाणी आणी, वैंस र यौ सर लीजै रे ।
हरि रस पैसि बिचालैं रसना, बेगौ बेगौ पीजै रे ॥१४५॥
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हे प्राणी ! तू इस प्रकार का मति = विवेक उत्पन्न कर कि जिसके द्वारा मनुष्य जन्म रूपी जल सही दिशा में गतिमान हो सके । यदि तू मनसा की पाल नहीं बांधेगा तो एक न एक दिन मनुष्य-जन्म रूपी मानसरोवर फूटकर बर्बाद हो जायेगा । वर्षा आने के पूर्व बांधी गई पाल वर्षा आने पर फूटती नहीं । समय रहते पाल बांध देने से सरोवर में जल बढ़ता ही है । 
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शरीर की आयु पूरी होने के पूर्व ही भजन-ध्यान करके परमात्मा की प्राप्ति का यत्न प्रारम्भ कर दिया जाता है तो एक न एक दिन परमात्मा का साक्षात्कार हो ही जाता है । जीवन व्यर्थ बर्बाद नहीं होता । अतः हे मेरे मन ! अबकी बार मनसा को परमात्माभिमुख करने रूपी पाल को इस प्रकार बांध कि उसमें परमात्मा की प्रेमयुक्त भक्ति रूपी जल प्रभूत मात्रा में एकत्रित हो जाये । 
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पाँच इंद्रियाँ तथा इनकी पचीस प्रकृतियाँ पूर्व में दशों दिशाओं में विषयभोग करती फिरती थीं । अब उनको बाहर से हटाकर अंतर्मुखी कर डाल । नौ प्रधान नाड़ियों तथा नौ सौ सहायक नाड़ियों की गति को उल्टाकर शब्द रूपी ब्रह्म की ओर कर दें । तीन गुण रूपी तीन ताल = सरोवरों की गहराई अतीव गंभीर है । अतः इन तीनों सरोवर को तैर कर चौथे सरोवर = तुरीयावस्था का सेझा = स्त्रोत प्राप्त कर ले, तुरीयावस्था में प्रविष्ट हो जा ।  
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सुरति को जल भरने वाली पनिहारी बनाकर मुक्ति रूपी घाट पर हरि रूपी जल हृदय रूपी कलश में भर । उस ब्रह्म रूपी सरोवर का पाणी रूपी भक्ति लाकर उसको अपने हृदय में विराजमान कर ले जिससे तुझे ब्रहम रूपी सरोवर मिल जायेगा । हरिरस में निमग्न होकर हृदय और रसना के माध्यम से इस हरिरस का जल्दी-जाल्दी पान कर ॥१४५॥ 

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