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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अवधू ! कामधेनु गहि राखी,*
*वश कीन्हीं तब अमृत स्रवै,*
*आगै चार न नाखी ॥*
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मनोवृत्ति ॥
गावड़ी राखौ हरिहावड़ी करती । बरजौ राति पसर ऊछरती ॥टेक॥
अहनिस खेत पराया खाइ । नीसरि जाइ बड़ी हरिहाइ ।
बाछा बाछी लियाँ संगि धावै । माँहै सांड दडूकतौ आवै ॥
जे न्यूजौ तौ न्याणौं तोड़ै । लाताँ मारि दुहावणौं फोड़ै ।
ठींगै मारै सो पसवावै । यौं खूँटै बांधी धेन दुहावै ॥
दूध घणाँ दे भूखाँ मरती । जाण मति देहु जठै पहली चरती ॥
घेरि घारि बषनौं घरि आणैं । नीसरि जाइ तौ परमेसुर जाणैं ॥१५३॥
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गावड़ी = गाय = वृत्ति । हरिहावड़ी = हरा खाने की आदी = विषयभोगों को भोगने की आदत वाली । राति = रात्रि । विषय भोगों का परिणाम अंधकार है । रात्री भी अंधकारमय ही होती है । हरिहावड़ी गाय प्रायः रात्री के समय में अथवा खेत के मालिक के खेत में न होने पर ही हरे खेत में घुसकर हरा चारा खाती है । पसर = पैस कर = प्रविष्ट होकर । ऊछरती = आनन्दपूर्वक, उत्साह पूर्वक चरती है । विषयभोग भोगती है ।
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पराया = मनसा का निजी काम परमात्मा का भजन करना है जबकि विषयों का भोग करना पराया माल खाना अथवा चौरी करना है । गाय दूसरों के खेत में जबरदस्ती घुसकर उसका खेत खाती है । नीसरि जाइ = आत्मकेन्द्रित करने के उपरांत भी आत्मध्यान छोड़कर विषयभोगों को भोगने को निकल पड़ती है । बाछी-बाछी = पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पांचों कर्मेन्द्रियाँ ।
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सांड = अहंकार । दडूकतौ = गर्जन करता हुआ । न्यूजौ तौ = बांधने पर, आत्मकेन्द्रित करने पर । न्याणौ = पिछले पैरों को बांधने की रस्सी = भगवद्ध्यान । दुहावणौं = जिसमें दूध निकाला जाता है, वह पात्र । ठींगै मारै = सींगों को पकड़कर चाबुक मारे = अहंकार को चूर्ण करके । पसवावै =स्तनों को धीरे-धरे सहलाने की क्रिया जिससे दूध स्तनों में उतरा आता है । खूँटे बांधै = आत्मकेन्द्रित करे ।
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विषयों की ओर दौड़ती हुई मनोवृत्ति को आत्मा में केन्द्रित करके रखो । विषय-भोगों को उत्साह पूर्वक भोगती हुई मनोवृत्ति को विषय भोगों में जाने से रोको । यह मनोवृत्ति अपना निजी आहार रामनाम का स्मरण-ध्यान न करके पराया आहार विषयभोगों को भोगती है ।
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इसे आत्मकेन्द्रित करने के उपरान्त भी यह टिकती नहीं है, विषयों की ओर दौड़ जाती है क्योंकि इसको विषयभोग करने की आदत पड़ी हुई है । विषयभोग भोगने में यह अकेली ही संलग्न नहीं होती, सभी इंद्रियों को भी अपने साथ में संयोजित करके भोग भोगती है ।
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वस्तुतः मन बिना हाथ पैर वाला पंगु है वह विषयों का चिंतन तो कर सकता है किन्तु उनका भौतिक उपभोग नहीं कर सकता । भौतिक भोग करने के लिये उसे सहायक चाहिये और वे सहायक यहाँ बाछा-बाछी रूपी इंद्रियों के रूप में चित्रित किये गये हैं । ऊपर से अहंकार रूपी सांड हुंकार करता हुआ चारों ओर घूमता है ।
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यदि इस मनोवृत्ति को एक लक्ष्य में केन्द्रित करने का प्रयत्न किया जाता है तो यह भगवद्ध्यान रूपी रस्सी को तोड़कर पुनः विषयोन्मुख हो जाती है । लातें मार-मार कर भगवत्प्रेम के आश्रय हृदय रूपी दुहावणें को भी तोड़ डालती है = छिन्न-भिन्न कर देती है ।
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इस मनोवृत्ति को रास्ते पर लाने का सही तरीका है, अहंकार रूपी सांड के माथे पर चोट करके अर्थात् अहंकार का सर्वथा त्याग करके धीरे-धीरे मनोवृत्ति को भगवदुन्मुख करे । तत्पश्चात मनोवृत्ति रूपी गाय को परब्रह्म-परमात्मा रूपी खूँटे में अटकाकर अहर्निश भजन-ध्यान करे = दूध दुहे । तब विषयभोगों में न जाती हुई मनोवृत्ति भगवतप्रेम रूपी दूध प्रभूत मात में देगी ।
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साधक का कर्तव्य है कि वह फिर उस मनोवृत्ति को पुनः उन विषयभोगों में रमण करने न जाने दे जिनका भोग वह पहले करती थी । बषनां कहता है, जैसे हो, वैसे ही इसको विषयभोगों से हटा-हटा कर आत्मध्यान में लगावे । इतने के उपरान्त भी यदि यह मनोवृत्ति लक्ष्य को छोड़कर विषयों की और भाग जाये तो उस साधक का तो भगवान ही मालिक है ॥१५३॥

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