शनिवार, 20 जून 2026

मनोवृत्ति ॥

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ ।*
*गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥*
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मनोवृत्ति ॥ साषी लापचारी की ॥
खैंचों तौ आवै नहीं, जे छोडौं तौ जाइ ॥
बषनां मनसा पूछ्ड़ै, प्राण टटीबा खाइ१ ॥(१ इसका अर्थ ‘मन कौ अंग’ की साषियों में देखें ।)
पद ॥
पहिलै ब्याइति ब्याई गाइ । कौंण दुहै कौंण मेलण जाइ ॥
लाताँ मारै बाँटौ खाइ । जाका बाछा बडी बलाइ ॥
काजल पीयल बरण अबरणी । तीनि लोक मैं फिरि फिरि चरणी ॥
बनि बनि फिरै सँमदि जल पीवै । धरणि गगन मैं पल फिरि आवै ॥
अंमृत सरवै भूखाँ मरती । धाई फिरै मछरता करती ॥
घेरि घारि कैं करौं उपाइ । तौ मारगि छाड़ि कुमारगि जाइ ॥
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साषी ॥
दूध की न मूत की, गाइ कहै सब कोइ
अैसि गाइ घर बारणैं, बैरी कै मति होइ ॥१॥
पद ॥
दूजै ब्याइति ब्याई गाइ । तिहि नैं गूजर दुहिबा जाइ ॥
सावणि ब्यावै हाथि न आवै । तिहि का माछर कौंण उडावै ॥
ले ले ठींगा दिहूँ ठहोड़ै । चरिबा तैं मन रती न मोड़ै ॥
खाँट इसी छींका का फोड़ै । तिहि नैं बषनां दुहिवा लोड़ै ॥
चंचल चपल चहूँ दिसि दोड़ै । मगरै जाती कौंण बहोड़ै ॥
बागि न मिलै हिली हरिहाई । भागी फिरै नहीं ठहराई ॥
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साषी ॥
बाँटौ ध्यौं नीरौं घणाँ, देखि घणाँ चराइ ।
माथै कीयाँ पूछड़ौ, या पहली खेताँ जाइ ॥२॥
पद ॥
तीजै ब्याइति अजहूँ ब्याई ॥ दूध घणाँ पणि हाथि न आई ॥
रात्यूँ दिहौं चराई प्याई । दूहौं कहा डोलै मछराई ॥
इसका थणाँ हाथ को लावै । तौ साम्हीं व्है मारण कूँ धावै ।
बछड़ा आठौं पहर खबावै । थण में लिसक रहण नहिं पावै ॥
रहै न हटकी रामैं जावै । खाली खरक न बैठक आवै ।
इनि मेरी छाती घणी पचाई । या गाइ मरै तौ करौ बधाई ॥
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साषी ॥
पहिलाँ तौ सूनी चरी, अब क्यौं आवै हाथि ।
दौड़ि दौड़ि केता मुवा, इस ढांढी कै साथि ॥३॥
पद ॥
चौथैं अब ऊन्हालै ब्याई ॥ भूखाँ मुई हाथि तब आई ।
सहजि सहजि जाइ बैठक बैठी । घेरी तब घर माँहैं पैठी ॥
गुर का ग्यान रासड़ी लाधी । बुचकारी ले खूँटै बांधी ॥
राम नाम धुणि धूणी लाइ । माछर दीना दूरि उडाई ॥
तब तिहि ढांढी धणी सुहाया । न्याणैं न्यूजि रु हाथ व लाया ॥
लात न मारै सदा दुहावै ॥ भूछ गूजरी महरि कहावै ॥
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साषी ॥
थण काटै था केरड़ा, सो तौ दिया बिडारि ।
ठींगै मारी पासवै, दूझै घर कै बारि ॥४॥
पद ॥
धेनि मिली तब दूधाँ धाया । दोइ दुहारा दुहिबा लाया ॥
बछड़ा घेरि अपूठा दीया । कनक कवल माँहै दुहि लीया
काम किरोध बलीतै बालौं । ऊफणि जासी बेगि सम्हालौं ॥
ताता सीला भेला कीया । तब गुरि मेरै जाँमण दीया ॥
सुन्दरि सहजि बिलोवण लागी । तब गहरै सादि मथाणी बागी ॥
मन मथिया तब माखण आया । साधौं हरि तत इहिं बिधि पाया ॥
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साषी ॥
गुजरी कै आनँद हुवा, दूझण लागी गाइ ।
अब बषणां रोटी घीव सौं, चोपड़ि चोपड़ि खाइ ॥५॥१५४॥
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चौपायों द्वारा बच्चों को जन्म देना उनका ब्याना कहलाता है । प्रसवावसर को ब्याइति, ‘ब्याँत’ आदि कहा जाता है । बषनांजी ने पूर्व पद की भाँति ही इस पद में भी गाय को मनोवृत्ति का प्रतीक मानकर मनोवृत्ति के नाना व्यापारों का चित्रण किया है । वे कहते हैं, गाय पहली बार ब्याई जिसका बछड़ा बहुत बड़ी बला = आफतें पैदा करने वाला है । मन की वृत्तियों ने स्वतंत्र रूप में पहले पहल विषयों का भोग करना प्रारम्भ किया ।
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इसके पूर्व बाल्यावस्था में) वे माता-पिता द्वारा उपलब्ध कराये विषयभोग बालक के रूप में भोगती थीं किन्तु जवान होने पर वे अपनी इच्छानुसार भोगों को भोगती हैं । यही गाय का पहली बार ब्याना तथा बछड़ा देना है । मनोवृत्ति की सहायक इंद्रियाँ ही बछड़ा है । वह प्रथम बार ब्याने वाली गाय खूब खाती है = अनियंत्रित रूप में विषयों का भोग करती है । रोकने पर लातें मारती है = रोकने वालों से भला-बुरा कहती है । ऐसी उच्छ्रंकल गाय का कौन तो दूध निकाले तथा कौन मेलण = नियंत्रित करे ।
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भगवद्भक्ति करना ही दूध निकालना है । वह मनोवृत्ति रूपी गाय काले-पीले रंगों वाली ही नहीं अनेकों रंगों वाली है । तीनों लोकों में भ्रमण करके अपने इच्छित भोगों को भोगती है । मनोवृत्ति रूपी गाय वन-वन में घूमती है, एक स्थान पर व एक विषय पर टिकती नहीं है । संसार रूपी समुद्र का जल पीती है ।
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घूमने-फिरने की गति इतनी क्षिप्र है कि वह पल भर में पूरी पृथ्वी, पूरा आकाश घूम-फिर आती है । जब इसको विषय भोग रूपी चारा पानी खूब मिलता है तब यह छँटाक भर दूध भी नहीं देती है । इसके विपरीत जब इसको खाने-पीने को नहीं मिलता है तब वह भगवत्स्मरण करने रूपी दूध प्रभूत मात्रा में देती है । जब खाने को खूब मिलता है तब मौज-मस्ती करती फिरती है ।
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बषनांजी कहते हैं, चूँकि भगवद्भक्तिमार्ग में यह नितांत नई है । अतः मैं इसे घेर-घारकर इधर-उधर से लाने का प्रयत्न करता हूँ किन्तु यह भगवद्भकति मार्ग छोड़कर पूर्वाभ्यास के अनुसार तत्काल विषय भोगों की ओर दौड़ जाती है । वस्तुतः यह संसारोन्मुखी मनोवृत्ति न भगवद्भक्ति मार्ग के लिये उपयोगी है और न संसार के लिये ही उपयुक्त है ।
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क्योंकि संसार में भी उस ही व्यक्ति को शोभा होती है जो अपना लोक सुधारते हुए परलोक सुधारने के प्रयत्न में लगा रहता है जबकि यह तो बस, लाओ-खाओ-मौज करो का सिद्धान्त अपनाए हुए रहती है । इसके बावजूद भी यह गाय कहलाती है । बषनांजी कहते हैं, ऐसी उच्छ्रंकल गाय रूपी मनोवृत्ति स्वयं के यहाँ तो क्या दुश्मन के दरवाजे पर भी नहीं होनी चाहिये ॥१॥
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दूसरी बार गर्भवती होने के उपरान्त गाय पुनः ब्याई जिसको साधक रूपी गूजर दुहने का प्रयत्न करता है । चूँकि दूसरी बार गाय श्रावण मास में ब्याई है । अतः उसको खाने को हरा-हरा मिलता है । वह गौशाला में बिलकुल ही रुकने का प्रयत्न नहीं करती । हर समय नये-नये भोग रूपी हरी-हरी घास खाने को दौड़ती-फिरती है । फलस्वरूप पकड़ में नहीं आती । जो सदैव भागती रहती है उसके मच्छरों को कौन उड़ा सकता है ।
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अर्थात् जो सदैव विषयभोगों में ही रमती फिरती है उस मनोवृत्ति द्वारा किये गये पापों कोन समाप्त कर सकता है ? जब उसको उसके दोनों श्रृंगों से पकड़कर नियंत्रित करने का प्रयत्न किया जाता है तब वह दोनों और माथा हिलाकर रोकने वालों को ही घायल करने का प्रयत्न करती है । गुरु रोकने वाला है । गरु की अवज्ञा करना ही दोनों ओर माथा हिलाना है ।
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वस्तुतः गुरूपदेश को न मानने वाली मनोवृत्ति विषयों में रमने से जरा भी अपने को विमुख नहीं करती है । यह मनोवृत्ति इतनी भारी खाँट = बदमाश है कि पूर्वजन्मार्जित पुण्य जो छींके में = संचितकर्म रूपी संदूक में = सुरक्षित जमापूंजी के रूप में जमा थे को भी नहीं छोड़ती । उन्हें भी दुष्कृत = दुष्कर्म करके समाप्त कर डालती है । ऐसी बदमाश = उच्छ्रंकल = विषयभोगों में आकंठ डूबी मनोवृत्ति को बषनां दुहिबा = दोहन करने का प्रयत्न करता है ।
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यह चंचल और चपल है, चारों ओर दौड़ती-फिरती है । मगरै = अतः विषयभोग रूपी जंगल में जाती हुई को कौन वापिस ला सकता है । बाग-बगीचों में हरियाली मिलती है । अतः वहाँ ही जाने के लिए हिल = गीद रही है । मिलती भी उन्हीं विषयभोग रूपी बगीचों में ही है । खूँटे पर तनिक देर के लिये भी रुकती नहीं है ।
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बषनांजी कहते हैं, मैंने सोचा, एक बार इसको छकाकर खिला दूँ । फिर स्वतः ही इसकी विषयभोगों में आसक्ति कम से कम होती चली जायेगी । एतदर्थ मैंने इसको खूब बाँट (खल, काँकडा, दलिया आदि) खिलाया । खूब चारा पानी नीरा (चारा पानी पशु के समक्ष खाने के लिये रखने को चारा नीरना कहते हैं) और देखा कि इसमें क्या कुछ परिवर्तन आया है । किन्तु यह तो विषयों में जाने से रुकने के बजाय उल्टे मस्तमौला होकर पूँछ ऊपर करके = उत्साहपूर्वक विषयभोग रूपी जंगलों में ही सबसे पहले भागती है ॥२॥
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तीसरी बार शीतकाल में ब्याई है । इस बार इसके नीचे दूध तो खूब है किन्तु गूजर(राजस्थान में गूजर जाति को गाय भैसों को पालने वाली जाति माना जाता है ।) को उस दूध में से कुछ मिलता नहीं है । गूजर ने रात-दिन इसको खूब चारा खिलाया और खूब पानी पिलाया जिससे यह आनंदमग्न हुई मौजमस्ती करती फिरती है । ऐसी स्थिति में इसके नीचे के दूध को कैसे दुहा जा सकता है ।
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यदि कोई इसके स्तनों के हाथ भी लगाता है तो वह हाथ लगाने वाले को हाथोंहाथ मारने को दौड़ती है । बछड़े को आठोंपहर खिलाती-पिलाती है जिससे इसके स्तनों में दूध की एक बूंद भी रहने नहीं पाती । मना करने पर रुकती नहीं, जंगल में चरने को भाग जाती है । गौशाला खाली पड़ी रहती है । उसमें बैठने को जंगल में से वापिस आती ही नहीं है । इस उच्छ्रंकल मनोवृत्ति ने मुझे खूब परेशान किया है । यदि यह मनोवृत्ति मर जाये = नियंत्रण में आजाए तो मैं अत्यधिक प्रसन्न होऊँ ।
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बषनांजी कहते हैं, पहले तो यह सूनी = बिना किसी रुकावट के ही चरती थी = मनोवृत्ति बिना नियंत्रण के ही विषयों को भोगती थी । सो अब कैसे नियंत्रण में आ सकती है । क्योंकि इसको भोगों को भोगने का अभ्यास जो पड़ गया है । इस ढांढी = धूर्त के साथ दौड़ दौड़कर = इसके अनुसार चल चलकर अनेकों मनुष्य मर चुके हैं किन्तु यह अपनी धूर्तता छोड़कर सज्जन = भगवदुन्मुख होने का प्रयत्न नहीं करती है ॥३॥
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इसबार उष्णकाल में ब्याई है । भगवद्भक्ति साधनकाल रूपी उष्णकाल में विषयभोग रूपी चारे की न्यूनता रहती है । अतः भूखों मरने लगी जिससे नियंत्रण में आ गई । धीरे-धीरे गौशाला में रहने लगी । सत्संग सुनने लगी, भजन-ध्यान करने की इच्छा करने लगी । जबसे इसको विषयों से एकदम विमुख कर दी, कहीं जाकर तबसे भगवान के ध्यान में स्थिर होने लगी है ।
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गुरु-ज्ञान रूपी रस्सी साधक को मिल गई जिससे समझाबुझाकर धीरज बंधाया कि अधीर होने की आवश्यकता नहीं है । परमात्ममार्ग पर चलने से लौकिक पारलौकिक दोनों सुख मिलते हैं और परमात्मा रूपी खूँटे से बांध दी । राम-राम की ध्वनि रूपी धूणी(कण्डों को जलाकर धुवाँ कर देने से मच्छर भाग जाते हैं) जला दी जिससे चंचलत्व उत्पन्न करने वाले समस्त विघ्न-कष्ट, पाप=कल्मष रूपी मच्छर भाग गये । तब उस बदमाश-धूर्त गाय = मनोवृत्ति को परमात्मा रूपी मालिक अच्छा लगने लगा ।
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परिणामस्वरूप दूध दुहने के काम आने वाली न्याणें की न्यूज = नेज = रस्सी हाथ में आ गई । अर्थात् अब काम में लेने की जरुरत नहीं रही । अब लात नहीं मारती प्रत्युत आराम से दूध भी दुहने देती है । परिणामस्वरूप संसारी जीव महात्मा(महरी = गूजर की पत्नी का सम्मानास्पद सम्बोधन) कहलाने लगी । पहले बत्स स्तनों को दूध न मिलने के कारण काटा करते थे सो उनको तो अब भगा दिया गया । उनके स्थान पर ठींगा मारने से ही पावस जाती है = दूध देने की इच्छुक हो जाती है और घर के द्वार पर बंधी बंधी दूध देती है ॥४॥
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परमात्मोन्मुख मनोवृत्ति जब परमात्मप्राप्ति के रास्ते पर चल पड़ी तब भगवद्भक्ति रूपी दूध प्रभूत मात्रा में स्तनों में आने लगा । विवेक-वैराग्य रूपी दो दुहने के पात्र बना लिये । मन रूपी बछड़े को संसार से उल्टाकर परमात्मा की ओर मोड़ दिया । निर्मल हृदय रूपी सोने के पात्र में दूध को निकाल लिया । काम-क्रोध रूपी लकड़ियों को जलाकर दूध को गर्म किया ।
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गुरुज्ञान रूपी सावधानी के बल पर तुरन्त ही उफनने = फिसलने रूपी पुनः संसार में जाने से रोक लिया । काम क्रोधादि दुर्गुण दुराचारों को और गुरु ज्ञान को एक स्थान पर एकत्रित करके दुर्गुण दुराचारों को दूर भगा दिया । तब गुरुमहाराज ने कृपा करके मुझे भगवद्भक्ति का रहस्य रूपी जामण देकर भगवद्धयान में स्थिर का दिया ।
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सुरति रूपी सुंदरि उस दही रूपी एकाग्रता में घूमने लगी = निमग्न हो गई । परिणामस्वरूप मथाणी = रई रूपी जिव्हा राम राम रटन रूपी गंभीर शब्द ध्वनि करने लगी । मन को मथ डाला । मक्खन रूपी परमात्मा की प्राप्ति हो गई । साधक ने इसप्रकार साधना करके परात्पर-परब्रह्म-हरि को प्राप्त किया । आत्मा रूपी गूजरी के अब परमानन्द हो गया क्योंकि अब मनोवृत्ति रूपी गाय भगवद्भक्ति रूपी दूध देने लग गई है । अतः बषनां परमात्मा की भक्ति रूपी घी से परमात्मएकाकारं रूपी रोटी को चोपड़-चोपड़ कर खाता है ॥१५४॥

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