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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २९/३२
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आयौ कर्म खवास चलि, नृपति जगावन हेत ।
सुंदर दीनी पुटपरी, अतिगति भयौ अचेत ॥२९॥
उसी समय उस राजा का कर्मरूप विशिष्ट सेवक राजा को जगाने के लिये वहाँ आया, परन्तु वह राजा को सोया हुआ देख कर उस के शरीर को सहला कर चला गया और राजा पहले की अपेक्षा अधिक सुखपूर्वक सो गया ॥२९॥
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देख्यौ भक्त प्रधान जब, राजा जाग्यौ नांहिं ।
सुन्दर संक करी नहीं, पकरि झंझोरी बांहिं ॥३०॥
परन्तु राजा के परम हितैषी विवेकरूप आत्मा ने जब देखा कि राजा अभी तक जागे नहीं हैं तो वह स्वयं निःसङ्कोच राजा के शयनगृह में पहुँचा और उस ने राजा को बाहु पकड़कर उठा दिया । तब राजा की निद्रा खुली ॥३०॥
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तव उठि करि बैठौ भयौ, बहुरि जंभाई खात ।
सुंदर कियौ बिचारि जब, तब जाग्यौ साक्षात ॥३१॥
वह उठकर बैठ गया । फिर जम्हाई(उबासी) ली । तब उसने सावधान होकर देखा तो समझ गया कि वह अब वस्तुतः जग गया है ॥३१॥
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देह वोर जो देखिये, पंच तत्त्व कौ देह ।
सुन्दर ब्रह्मा कीट लौं, करहु बिचार सु येह ॥३२॥
तब सर्वप्रथम उसने अपने देह के विषय में विचारा, उस के यही समझ में आया कि ब्रह्मा से आरम्भ कर कीटपर्यन्त सभी प्राणियों का शरीर पञ्च तत्त्वों से ही बना हुआ है ॥३२॥
(क्रमशः)

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